बिजली कंपनी के संचारण-संधारण संभाग, गुना में सामने आए करीब 61 लाख रुपए के वेतन घोटाले की जांच अब सवालों के घेरे में है।
चार महीने पहले पुलिस तक पहुंचे इस मामले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जबकि जांच के दौरान कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सामने आने की चर्चा है।
आउटसोर्स कर्मचारी पर ठीकरा, अफसरों तक पहुंचे तार तो सुस्त पड़ी कार्रवाई
सूत्रों के मुताबिक शुरुआती स्तर पर पूरे मामले का जिम्मा एक आउटसोर्स कर्मचारी पर डालने की कोशिश की गई।
कम्प्यूटर ऑपरेटर विकास गिरी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया गया, लेकिन पुलिस जांच में घोटाले की कड़ियां विभाग के भीतर तक जाती नजर आईं।
बताया जा रहा है कि डिवीजनल इंजीनियर समेत अन्य अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी।
नोटिस जारी हुए, फिर जांच की रफ्तार थम गई
जानकारी के अनुसार पुलिस ने कुछ अधिकारियों को पूछताछ के लिए नोटिस भी भेजे थे। कई अधिकारियों के बयान दर्ज किए गए, लेकिन इसके बाद मामला अचानक धीमा पड़ गया।
सूत्रों का दावा है कि प्रकरण में अंदरखाने लीपापोती की कोशिशें शुरू हो गईं।
विवेचक बदलीं तो फाइल भी ठंडी पड़ गई
मामले की जांच तत्कालीन उपनिरीक्षक माधवी तोमर कर रही थीं। उन्होंने सख्ती दिखाते हुए बिजली कंपनी के आधा दर्जन से अधिक अधिकारियों को तलब किया था।
हालांकि उनके तबादले के बाद जांच लगभग ठहर गई। थाना सूत्रों के मुताबिक अब तक केस डायरी किसी नए विवेचक को नहीं सौंपी गई है, जिससे विवेचना आगे नहीं बढ़ सकी।
विधि विशेषज्ञों की राय का इंतजार
पूर्व विवेचक माधवी तोमर ने बताया कि संबंधित लोगों के कथन दर्ज किए जा चुके हैं। अब विधि विशेषज्ञों की राय के बाद आगे की चालानी कार्रवाई की जानी है।
उन्होंने कहा कि उनका तबादला हो चुका है और वह ग्वालियर में आमद भी दे चुकी हैं।
वह अब यह केस नहीं देख रही हैं। इधर, मामले में देरी और जांच की सुस्ती को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं।