जबलपुर के क्लीनिकों में इलाज नहीं, फाइलों में ‘फर्जी स्वास्थ्य सेवा’ का खेल

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जबलपुर।

मध्य प्रदेश की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक योजना जबलपुर में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। जिन क्लीनिकों में मुफ्त इलाज और दवाएं मिलनी थीं,वहां मरीजों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं हो रहीं।

हैरत की बात यह कि सरकारी फाइलों में सब कुछ “अपडेट” दिखाया जा चुका है। बड़ा सवाल यही कि जब ‘संजीवनी’ ही बीमार हो जाए, तो मरीजों का इलाज कौन करेगा?

कागजों में करोड़ों खर्च, जमीन पर सन्नाटा

सूत्रों के मुताबिक,कलेक्टर राघवेंद्र सिंह और डिप्टी कलेक्टर आर.एस. मरावी की जांच में सामने आया कि बिना खरीदी के ही करीब ₹1.75 करोड़ का भुगतान कर दिया गया। हालात ये हैं कि—

—क्लीनिकों में न कंप्यूटर, न मशीनें
—2 साल से पुताई तक नहीं हुई। फिर भी मेंटेनेंस और उपकरणों के बिल पास हो गए।

जांच से पहले ‘हड़बड़ी का मेकअप’

जैसे ही जांच शुरू हुई, अफसरों ने आनन-फानन में कुछ सेंटरों पर प्रिंटर भेज दिए।
लेकिन डॉक्टरों का सवाल साफ था—“जब कंप्यूटर ही नहीं है, तो प्रिंटर का क्या करेंगे?”

93 लाख का सामान ‘गायब’

डिप्टी कलेक्टर आर एस मरावी की प्रारंभिक जांच में सामने आया, कि ₹93 लाख का सामान न स्टोर में, न क्लीनिक में। भंडार रजिस्टर में फर्जी एंट्रियां की गई। कई जगह अलमारियां तक नहीं, जबकि भुगतान हो चुका है।

5 पॉइंट में समझें पूरा घोटाला

1. फर्जी बिलिंग:
13 फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों का भुगतान

2. कागजी मरम्मत:
दीवारें जस की तस, लेकिन लाखों की पुताई दिखा दी।

3. गायब उपकरण:
बीपी मशीन, ग्लूकोमीटर, वेट मशीन सिर्फ कागजों में दर्ज हैं,हकीकत में नहीं।

4. जांच का डर:
जांच शुरू होते ही ‘दिखावे’ के उपकरण यानी प्रिंटर भेजे गए।

5. निजी संसाधनों से इलाज:
-डॉक्टर अपने पर्सनल डिवाइस से मरीज देख रहे हैं। गोरैया घाट क्लीनिक की मेडिकल ऑफिसर डॉ. सौम्या अग्रवाल ने मीडिया को बताया कि—

— उन्हें आज तक सरकारी कंप्यूटर नहीं मिला।
— वे अपने पर्सनल टैबलेट से मरीजों की एंट्री कर रही हैं।
— जरूरी उपकरणों की मांग महीनों से लंबित थी।

50 क्लीनिक, लेकिन बुनियादी सुविधा तक नहीं

जबलपुर के करीब 50 संजीवनी क्लीनिकों में—

-अधिकांश जगह जरूरी मशीनें नहीं
-जिनके नाम पर भुगतान हुआ, वे कहीं मौजूद नहीं
-घोटाले का दायरा बढ़ने के संकेत

अब तक ₹93 लाख की गड़बड़ी प्रमाणित हो चुकी है, लेकिन जांच अधिकारियों का अनुमान है कि— यदि 2021 से अब तक की फाइलें खंगाली गईं, तो यह घोटाला ₹10 करोड़ पार कर सकता है।

बड़ी कार्रवाई: मास्टरमाइंड सस्पेंड
—ज्वाइंट डायरेक्टर (हेल्थ) और CMHO डॉ. संजय मिश्रा निलंबित।
—DPMU के अधिकारी हटाए गए।
—फार्मासिस्ट पर भी कार्रवाई की गई।
—डॉ. संजय मिश्रा की निजी लैब और आय से अधिक संपत्ति के मामलों की भी जांच शुरू हो गई है।

मुख्यालय के जिम्मेदारों की भी तय हो जवाबदेही
सूत्रों का दावा है कि यदि प्रदेशभर में संजीवनी क्लीनिक्स का भौतिक सत्यापन हो तो इस तरह के घोटाले और भी जगह सामने आ सकते हैं।

विभाग मुख्यालय में बैठे जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। जिनके पास निगरानी का दायित्व है।

बता दें​ कि बीते कुछ वर्षों में स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार का बड़ा अड्डा बन गया है। बीते साल उजागर नर्सिंग घोटाले ने देशभर में मप्र की कि​रकिरी कराई।