रवि अवस्थी,भोपाल।
आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए बने कानून ही अब सवालों के घेरे में हैं।
आदिवासी बहुल जिलों में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में जमीनें गैर-आदिवासियों के नाम हस्तांतरित हुईं-और हर बार आधार बना मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 165(6)।
आरोप है कि कलेक्टर की अनुमति की प्रक्रिया ही इस खरीद-फरोख्त का औपचारिक जरिया बन गई।
नैनोद की जमीन, विधानसभा तक गूंज

इंदौर की मल्हारगंज तहसील के ग्राम नैनोद (आदिवासी बहुल) में सर्वे नंबर 4 की करीब 2 हेक्टेयर कृषि भूमि 2018 में एक संपन्न परिवार ने खरीदी।
10 जुलाई 2024 को मामला विधानसभा में उठा तो सरकार ने इंदौर संभागायुक्त से जांच की घोषणा की।
पर महीनों बाद भी प्रतिवेदन लंबित है। हालिया सत्र में एक दिन पहले फिर सवाल उठा तो जवाब मिला-रिपोर्ट आने पर कार्रवाई होगी।
धारा 165(6): सुरक्षा का प्रावधान, विवाद का आधार
धारा 165(6) का उद्देश्य आदिवासी भूमिधरों की जमीन को दबाव, छल या दलाली से बचाना है।
नियम कहता है कि अनुसूचित जनजाति की कृषि भूमि का गैर-आदिवासी को हस्तांतरण कलेक्टर की पूर्व अनुमति से ही संभव है।
सरकार का तर्क है कि जहां-जहां सौदे हुए, वहां अनुमति विधिवत दी गई। विपक्ष पूछ रहा है-क्या हर अनुमति वास्तव में “स्वेच्छा” और “न्यायसंगत मूल्य” की कसौटी पर खरी उतरी?
बेनामी की परत: बांधवगढ़ के बफर जोन का मामला
पिछले वर्ष भोपाल में आयकर विभाग की बेनामी निषेध इकाई ने बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के बफर जोन की करीब 12 एकड़ जमीन अटैच की।
उमरिया जिले के मानपुर तहसील स्थित ताला-महामन गांव की यह भूमि कथित तौर पर एक कारोबारी ने अपने आदिवासी कर्मचारी के नाम रजिस्ट्री कराई थी।
उद्देश्य-रिजॉर्ट/रेस्तरां/होमस्टे। प्रशासनिक अड़चनों के बाद मामला आयकर तक पहुंचा। यह उदाहरण बताता है कि कानूनी पेंच से बचने के लिए “बेनामी” रास्ते भी अपनाए जा रहे हैं।
इंदौर संभाग में 474 प्रकरण
जुलाई 2024 में पूर्व मंत्री बाला बच्चन ने विधानसभा में सवाल उठाया। सरकार ने 2009 से 2023 के बीच इंदौर संभाग में 474 आदिवासी जमीनों के हस्तांतरण की पुष्टि की।
कहा-सभी कलेक्टर अनुमति से। नैनोद का प्रकरण अटका तो सरकार भी स्पष्ट जवाब देने की स्थिति में नहीं दिखी।
महाकौशल में भी रफ्तार

















