MP: हाईकोर्ट ने सीएस को तलब किया तो जीएडी को याद आए नियम

232

रवि अवस्थी,भोपाल।
हाईकोर्ट द्वारा मुख्य सचिव को 4 मई को पेश होने के निर्देश दिए जाने के बाद अब सरकार हरकत में आ गई है।

अवमानना और लंबित मामलों को लेकर बढ़ती सख्ती के बीच सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने हाल ही में एक परिपत्र जारी किया। जिसमें अदालतों में समय पर जवाब देने और आदेशों का पालन सुनिश्चित करने की नसीहत दी गई।

सीएस को कोर्ट में तलब होने के आदेश
प्रकरण 2016 से लंबित उच्च वेतनमान आदेश से जुड़ा है। इसका पालन नहीं होने पर अवमानना प्रकरण दायर हुआ।

इसी केस में हाईकोर्ट जबलपुर ने आगामी 4 मई को शासन से जवाब तलब किया है। इस प्रकरण में मुख्य सचिव को स्वयं न्यायालय में उपस्थित होने का फरमान कोर्ट ने सुनाया है। यह याचिका हाईकोर्ट के कर्मचारी किशन पिल्लई व अन्य की ओर से ही दायर की गई।

GAD का सख्त संदेश: अब देरी नहीं चलेगी

हालांकि सीएस को कोर्ट में हाजिर होने का फैसला 11 अप्रैल को जारी हुआ,लेकिन इसका पूर्वानुमान होते ही जीएडी ने करीब एक सप्ताह पहले यानी 4 अप्रैल को यह परिपत्र जारी किया।

करीब 12 पन्नों के इस परिपत्र में जीएडी ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला दिया है। इसमें कहा गया कि कोर्ट मामलों में देरी या हीला-हवाली अब सीधे जिम्मेदारी तय करेगी।

परिपत्र में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि—

– कोर्ट मामलों में तय समयसीमा में जवाब दिया जाए।
– अवमानना के मामलों में आदेशों का पालन अनिवार्य हो।
– कानूनी मामलों में लापरवाही से बचा जाए।

————————————————————–
🔹 उदाहरण 1: अंकसूची विवाद में उलझा विभाग
राज्य शिक्षा केंद्र ने महर्षि विश्वविद्यालय की अंकसूचियों को अमान्य घोषित कर तीन लेखापालों की सेवाएं समाप्त की थीं। बर्खास्त लेखापालों ने हाईकोर्ट की शरण ली,लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली।

न्यायालय ने राज्य शिक्षा केंद्र के फैसले को सही ठहराया।बाद में संबंधित विवि ने ग्वालियर हाईकोर्ट खंडपीठ में इस तर्क के साथ याचिका दायर की,कि संबंधित प्रकरण में उसे नहीं सुना गया। जीत विवि की हुई।

खंडपीठ के फैसले को लेकर राज्य विधानसभा के बीते बजट सत्र में कांग्रेस विधायक मधु भगत ने सवाल उठाया। उन्होंने पूछा-सरकार फैसले से सहमत है या असहमत। अ​सहमत है तो आगे क्या प्रक्रिया अपनाई गई।

उच्च शिक्षा विभाग ने महाधिवक्ता कार्यालय से अभिमत लेने की बात कहकर बचता नजर आया। यह मामला दिखाता है कि समय पर कानूनी रणनीति न होने से स्थिति पलट सकती है।

🔹 उदाहरण 2: कोहेफिजा अतिक्रमण में मिली ढिलाई की कीमत

भोपाल के कोहेफिजा में अवैध निर्माण के मामले में नगर निगम की सुस्ती भारी पड़ी।
समय पर कार्रवाई नहीं हुई।
– कागजी औपचारिकताएं चलती रहीं।

– संबंधित पक्ष कोर्ट से स्टे ले आया।

-नतीजतन, मामला कोर्ट में पहुंच गया और प्रशासन के हाथ बंध गए।

-बीते बजट सत्र में कांग्रेस के बाला बच्चन ने यह मामला उठाया। जवाब में नगरीय विकास एवं आवास मंत्री ने मामला न्यायालयीन हो जाने की विवशता दर्शाई।

🔹 उदाहरण 3: आदेश अनदेखा, अफसरों को सजा

मंदसौर में वार्ड बॉय के नियमितिकरण के कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हुआ। अवमानना के इसी केस में हाईकोर्ट इंदौर ने बीते माह की 25 तारीख को पूर्व ACS मोहम्मद सुलेमान सहित 4 अधिकारियों को 2 महीने की सजा सुनाई। हालांकि बाद में आदेश पर अस्थायी रोक मिली, लेकिन यह उदाहरण प्रशासन के लिए चेतावनी बन गया है।

🔹 उदाहरण 4: IAS तक को कोर्ट में पेशी

सीधी जिले के पदोन्नति विवाद में IAS अधिकारी भरत यादव को एक दिन पहले (15 April 2026) हाईकोर्ट में पेश होना पड़ा।

कर्मचारी के पक्ष में फैसला आने के बावजूद विभाग ने आदेश लागू नहीं किया। इससे स्पष्ट है कि आदेशों की अनदेखी अब सीधे जवाबदेही तय कर रही है।

🔹 नतीजा: बढ़ती अवमानना, घटती साख

इन सभी मामलों का साझा असर साफ दिख रहा है—

-अवमानना प्रकरणों में तेजी।
-अफसरों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय।
-सरकार की ‘वेवजह’ किरकिरी।

संकेत साफ हैं,अब तय होगी व्यक्तिगत जिम्मेदारी

4 मई की सुनवाई से पहले सरकार की सक्रियता यह संकेत देती है कि अब अदालतों की सख्ती को नजरअंदाज करना संभव नहीं है।

अगर विभाग समय पर फैसले और आदेशों का पालन नहीं करते, तो आने वाले समय में ऐसे मामलों और सजा के उदाहरण बढ़ सकते हैं। जिम्मेदारी व्यक्तिगत भी तय हो सकती है। जो होना भी चाहिए।