रवि अवस्थी,भोपाल / मप्र में सरकारी जमीनों की बंदरबांट नई बात नहीं है। अब तक यह काम स्थानीय लोगों के बीच ही होता रहा। पहली बार,टीकमगढ़ जिले की आठ पंचायतों ने एक कदम आगे बढ़कर अपने गांव की सरकारी जमीन ब्रिटेन की एक निजी कंपनी को लीज पर दे डाली।
यह भी एक-दो नहीं बल्कि करीब पांच सौ एकड़। गनीमत यह रही कि स्थानीय कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह ने सजगता का परिचय देते हुए मामले को विधानसभा में उठाया। इस तरह जिले के अफसरों व पंचायतों की सांठगांठ का भांडा फूट गया। आइए जानते हैं,क्या कुछ है मामला.
सरकारी जमीन आवंटन की मांग
यह टीकमगढ़ जनपद पंचायत,जिसके अधीन जिले की 82 ग्राम पंचायतें हैं.गए साल 6 सितंबर को झांसी उप्र की एक स्वयं सेवी संस्था हरीतिका ने तत्कालीन कलेक्टर अवधेश शर्मा को एक प्रस्ताव सौंपा। इसमें हरीतिका ने खुद को आक्सफोर्ड ब्रिटेन की एक निजी कंपनी सीआईपीएल की सहयोगी बताते हुए सरकारी जमीन आवंटन की मांग की गई। वजह बताई गई कि जिले का पर्यावरण सुधारने पौधरोपण किया जाना।
इस पत्र को ऐसे पंख लगे कि दस दिन बाद ही जिला मुख्यालय से सटी आठ पंचायतों ने संस्था से हजार-हजार रुपए के स्टाम्प पर अनुबंध किया और करीब पांच सौ एकड़ सरकारी जमीन 40 साल की लीज पर संस्था के नाम कर दी। शर्त यह भी रखी गई कि लीज अवधि पूरी होने पर इसे अगले 5-5 सालों के लिए बढ़ाया जा सकेगा। जमीन आवंटित होते ही संस्था ने इसका कब्जा हासिल किया और तार फेंसिंग कर अपना बोर्ड लगा दिया।
आनन-फानन में लीज निरस्त
मामले का खुलासा उस वक्त हुआ जब राज्य विधानसभा के पिछले सत्र में कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह ने एक लिखित प्रश्न के जरिए इसके जुड़ी जानकारी मांगी। विधानसभा प्रश्न लगते ही जिले में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में आठों पंचायतों में लीज निरस्त कर यह जताने की कोशिश हुई कि प्रकरण में शासन को कोई नुकसान नहीं हुआ,लिहाजा इस मामले में कोई दोषी नहीं है।
लेकिन द सूत्र ने जब प्रकरण की तहकीकात की तो सरकारी जमीन की बंदरबांट में जिले के जिम्मेदार अफसरों,संस्था व पंचायतों के गठजोड़ का बड़ा खुलासा हुआ। इसकी बानगी जनपद सीईओ आशीष अग्रवाल का इलाके के एसडीएम को गत 5 मार्च को लिखा गया वह पत्र है, जिसके बिंदु क्रमांक 4 में साफ कहा गया कि प्रकरण में अधिकारियों के लिखित व मौखिक निर्देशन की जानकारी श्रीमान को पूर्व से ज्ञात है…यानी सब कुछ अफसरों के निर्देश पर हुआ…
मासूमियत के साथ गिनाए आवंटन के कारण
जनपद सीईओ अग्रवाल के इसी स्पष्टीकरण में लीज आवंटन के कारण भी बेहद मासूमियत के साथ गिनाए गए। अग्रवाल ने लिखा कि आवंटित भूमि अतिक्रमण मुक्त कराई गई थी। इस पर दोबारा अतिक्रमण न हो संभवतया इसी मंशा से इसे संस्था को आवंटित किया गया। उनके मासूम जवाब का दूसरा उदाहरण देखिए..अग्रवाल लिखते हैं कि लीज अनुबंध करने वालों को संभवतया इस बात की जानकारी नहीं रही होगी कि उन्हें सरकारी जमीन बांटने का अधिकार नहीं है। पत्र में वह संस्था के काम को लोकहित का बताते हुए,पटवारियों का जमीन की फेंसिंग में सहयोग करने,लेकिन इसकी जानकारी जनपद को नहीं दिए जाने की बात भी कहते हैं..सीईओ यह लिखना भी नहीं भूले कि लीज निरस्त होने से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ,लिहाजा प्रकरण में कोई भी दोषी नहीं है।
नए सिरे से जांच की बात
मामला उजागर होने पर जिले के मौजूदा कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय अब इस मामले की नए सिरे से जांच की बात कह रहे हैं.श्रोत्रिय ने कहा कि पंचायतों ने खुद को जमीन का मालिक बताते हुए इसका लीज अनुबंध किया. जबकि यह साफ है कि सरकारी जमीन शासन की अनुमति बिना किसी को नहीं दी जा सकती..दूसरी ओर क्षेत्रीय विधायक यादवेंद्र सिंह प्रकरण में दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं..उन्होंने कहा कि एक्शन नहीं हुआ तो वह फिर इस मामले को सदन में उठाएंगे.
कौन है जमीन हथियाने वाली संस्थाएं व इनका असल मकसद
सीआईपीएल यानी क्लाईमेट इम्पेक्ट पार्टनर,ब्रिटेन में आक्सफोर्ड स्थित एक निजी कंपनी है,जो बहुराष्ट्रीय औद्योगिक कंपनियों को कार्बन क्रेडिट बेचने का काम करती रही है.हरीतिका भारत में इसकी सहयोगी संस्था है जो एक तरह से जमीन हासिल कर इस पर कार्बन उत्सर्जन का मैदान तैयार करती है।
भारत में कार्बन क्रेडिट की कीमत भले ही 4 सौ 6 सौ रुपए मीट्रिक टन हो लेकिन ब्रिटेन में इसके दाम 47 पाउंड यानी सवा पांच हजार रुपए प्रति मीट्रिक टन तक है.विशेषकर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के कार्यकाल में कार्बन क्रेडिट के बाजार में खूब उछाल आया.
सीआईपीएल व हरीतिका ने टीकमगढ़ जिले की पंचायतों ने जो अनुबंध किए उसमें साफ लिखा गया कि वृक्षारोपण से तैयार ईपीएस यानी इको एक्टीवेशन सिस्टम अर्थात पारिस्थितिकी तंत्र सक्रियण प्रणाली पर सिर्फ और सिर्फ सीआईपीएल का ही अधिकार होगा। अनुबंध की इस एक शर्त से विदेशी कंपनी की मंशा को समझा जा सकता है..
बताया जाता है हरीतिका बुंदेलखंड के अन्य जिले पन्ना,निवाड़ी,छतरपुर व अन्य जिलों में भी सक्रिय रही है..सरकार को ऐसे सभी मामलों की जांच कराना चाहिए ताकि सरकारी भूमि विदेशी हाथों में जाने से बच सके।