रवि अवस्थी ,भोपाल। ,MP assembly Election 2023 ; राजगढ़ जिले का ब्यावरा विधानसभा क्षेत्र Biaora Constituencyअपने सियासी उलटफेर और जातिगत समीकरणों के लिए जाना जाता है….राजस्थान की सीमा से लगे होने से पड़ोसी राज्य की सियासी तासीर यहां भी नजर आती है..
यहां के सियासी समीकरण विकास से कम,जातिगत आधार पर ज्यादा तय होते हैं.. क्षेत्र में विकास का जबरदस्त अभाव है लेकिन जातिगत समीकरणों Cast equation का बोलबाला है… राजघरानों से गहरा ताल्लुक रखने वाले सिंधिया और होलकर के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र का अपना इतिहास रहा है…लेकिन 2023 के चुनाव में इस क्षेत्र का सियासी गणित क्या रहेगा .. आइए डालते हैं इस पर एक नजर…
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मप्र गठन के साथ ही अस्तित्व में आई ब्यावरा सीट
राघोगढ़ किले की राजनीति से प्रभावित रही यह सीट
राजगढ़-ब्यावरा में कभी था भील राजाओं का शासन
राजधानी के नजदीक होने के बाद भी अलग मिजाज
एक,दो अपवाद को छोड़ हर बार बदले गए प्रतिनिधि
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राजस्थान से है मिलता -जुलता मिजाज
ब्यावरा विधानसभा सीट के सियासी इतिहास पर नजर डाली जाए तो चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी बारी-बारी से यह सीट जीतती रही है…निर्दलीय प्रत्याशी भी यहां जीत दर्ज करते रहे हैं… ब्यावरा विधानसभा सीट 1957 में गठित हुई.. इस सीट के लिए अब तक 14 आम व 2020 में एक उप चुनाव हुआ..जिनमें छह बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की तो चार बार बीजेपी BJP के प्रत्याशी ने बाजी मारी…चार बार निर्दलीय प्रत्याशी अपनी दम पर विजयी रहे..एक बार जेएनपी JNP यानी जनतांत्रिक नेशनल पार्टी ने भी यहां जीत का स्वाद चखा…
लेकिन 1977 की बात है..जब देश आपातकाल के दौर से गुजरा था..ब्यावरा में किसी भी प्रत्याशी का दोबारा जीत दर्ज करना मुश्किल होता है.. इस सीट के अब तक के सियासी इतिहास में दत्तात्रेय माधव राव ही एक मात्र प्रत्याशी रहे.., जो 1977 व 80 में लगातार दो बार चुनाव जीते..सीट से दो बार विधायक और भी बने लेकिन एक चुनाव के अंतराल से..सीट के इस सियासी मिजाज को देखते हुए दोनों पार्टियां हर चुनाव में यहां प्रत्याशी बदलती रही हैं..2020 में हुए उपचुनाव में बीजेपी ने प्रत्याशी दोहराया तो उसे पराजय का सामना करना पड़ा..
ब्यावरा में कब किस दल से कौन रहा विधायक
2020 रामचंद्र दांगी कांग्रेस
2018 गोवर्धन सिंह कांग्रेस
2013 नारायण सिंह पंवार बीजेपी
2008 पुरुषोत्तम दांगी कांग्रेस
2003 बद्रीलाल यादव बीजेपी
1998 ताम्रध्वज साहू कांग्रेस
1993 बद्रीलाल यादव बीजेपी
1990 दत्तात्रेय राव कांग्रेस
1985 जागेश्वर साहू कांग्रेस
1980 दत्तात्रेय राव बीजेपी
1977 दत्तात्रेय राव जेएनपी
1972 रामकरण उग्र कांग्रेस
1967 जगन्नाथ —
1962 रामकरण उग्र —
1957 लक्ष्मण सिंह —
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दांगी,सोंधिया समाज का रहा दबदबा
क्षेत्र में पानी, रोजगार,शिक्षा ,बंजर जमीन,पलायन जैसी अनेक समस्याएं हैं …. लेकिन जातिगत समीकरण के आगे इनके कोई मायने नहीं … ब्यावरा विधानसभा सीट में कुल 2 लाख 35 हजार 276 मतदाता हैं.. जिनमें 1 लाख 21 हजार 223 पुरुष…तो वहीं 1 लाख 14 हजार 53 महिला मतदाता हैं…जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां चुनाव में दांगी Dangi और सोंधिया Saundhiya समाज का दबदबा रहा है..ब्यावरा Beora में दांगी समाज का वोट बैंक 30 से 35 हजार,सोंधिया मतदाता 25 से 30 हजार के बीच हैं—
क्षेत्र में समस्याएं –
-रोजगार का टोटा
– उद्योग व फैक्ट्रियों का अभाव
– तकनीकी व मेडिकल शिक्षा का अभाव
– पेयजल समस्या
– बंजर जमीन,
– लोड़वाल क्षेत्र से पलायन
– स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
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लिहाजा पार्टियां इन्हीं जातियों से आने वाले प्रत्याशियों पर दांव लगाती हैं….दांगी और सोंधिया बाहुल्य इलाके में लोधी, गुर्जर,मीणा और यादव मतदाता निर्णायक साबित होते हैं, जिससे इस वोट बैंक पर भी हर पार्टी की नजर होती है….एक तथ्य यह भी कि ब्यावरा सीट पर जब.जब जातिगत आधार पर प्रत्याशी का चयन हुआ..तब.तब जीत.हार का अंतर मामूली रहा…
मसलन,तीन साल पहले ब्यावरा के कांग्रेसी विधायक गोवर्धन लाल दांगी के निधन के बाद कांग्रेस ने स्वर्गीय दांगी नजदीकी रहे रामचंद्र दांगी पर दांव लगाया तो भाजपा ने 2018 में गोवर्धन लाल से चुनाव हारे नारायण सिंह पंवार पर…
उपचुनाव में इनके बीच कडी टक्कर रही और जीत,हार का अंतर महज 826 वोट था…खास बात यह कि ब्यावरा में जातिगत फैक्टर के आधार पर ही पार्टियों के स्टार प्रचारक भी तय होते हैं..। जातिगत आधार पर जिस दल का जितना जोर..वही बना ब्यावरा का सिकंदर..
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कुछ इस तरह हैं यहां के जातिगत समीकरण
ब्यावरा में कुल मतदाता 2,35,276
दांगी 30-35 हजार
सोंधिया 25-30 हजार
यादव 18-20 हजार
गुर्जर 12-14 हजार
लोधी 14-16 हजार
मुस्लिम- 08-09 हजार
वैश्य 13-15 हजार
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ब्यावरा में दिग्विजय सिंह का दबदबा
राजगढ़ की बात हो तो कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह का नाम सबसे ऊपर चर्चा में होता है.. राजगढ़ जिले का गठन मई, 1948 में मध्य भारत के गठन के बाद किया गया था…यूं तो यह तीन रियासतों का हिस्सा रहा..लेकिन गुना जिले की राघोगढ़ रियासत का प्रभाव ज्यादा रहा..इसके चलते ब्यावरा विधानसभा सीट पर दिग्विजय सिंह का दबदबा माना जाता है..
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हर बार नया ही बनता है विधायक
3 दशक पूर्व शुरू हुई विधायक बदलने की परंपरा
1993 में भाजपा से बद्रीलाल यादव बने विधायक
1998 में कांग्रेस से बलराम सिंह गुर्जर चुने गए
2003 में फिर भाजपा के बद्री लाल यादव जीते
2008 में कांग्रेस के पुरुषोत्तम दांगी बने एमएलए
2013 में भाजपा के नारायणसिंह पंवार निर्वाचित
2018 में कांग्रेस के गोवर्धन दांगी बने विधायक
2020 के उपचुनाव में कांग्रेस के रामचंद्र जीते
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यही वजह है कि इस सीट के अब तक उतारे गए कांग्रेस के ज्यादातर प्रत्याशी दिग्विजय सिंह की पसंद के रहे…2018 के विधानसभा चुनाव में ही कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह के करीबी गोवर्धन दांगी को मैदान में उतारकर जीत दर्ज की थी…उन्होंने बीजेपी के नारायण सिंह पंवार को करीबी अंतर से चुनाव हराया..














