MP The Heart of India: यह विकास का मामला है

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सत्ता के गलियारे… मप्र में घटित बीते सप्ताह के राजनितिक ,सामाजिक , प्रशासनिक चंद महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ है। यह रचनात्मक दृष्टिकोण से घटनाओं की संक्षिप्त समीक्षा का एक प्रयास है। … रवि अवस्थी ,भोपाल(मप्र )

MP The Heart of Indiaप्रदेश में विकास की गति को लेकर राज्य के विपक्षी दलों व आलोचकों की राय भले कुछ भी हो लेकिन केंद्र और दूसरे राज्य आत्मनिर्भरता की ओर मध्य प्रदेश के बढ़ते कदम की गवाही देते हैं।

महाराष्ट्र के अमरावती जिले की धारणी तहसील के हजारों ग्रामीणों का दो दिन पहले मप्र,महाराष्ट्र की सीमा पर हुआ प्रदर्शन इसकी बानगी है। प्रदर्शनकारियों की मांग धारणी के 141 गांवों को मप्र में शामिल करने की है।

वे अपने प्रदेश की सीमा से सटे मप्र के बुरहानपुर,खंडवा व बैतूल जिलों में हुए विकास कार्यों से प्रभावित हैं। वहीं अपने तहसील क्षेत्र की दुर्दशा व भाषाई समस्या से त्रस्त।

प्रदर्शनकारियों की मानें तो धारणी के अधिकांश गांव बिजली,सडक व कुपोषण जैसी समस्या से जूझ रहे हैं। तहसील की जिला मुख्यालय से दूरी ही 190 किमी है और वहां तक पहुंच मार्ग का अधिकांश हिस्सा तो रास्ता कहलाने लायक भी नही।

हैरत की बात यह कि एक ओर महाराष्ट्र , कर्नाटक के 865 गांवों को अपने राज्य में मिलाने लंबे अरसे से लड़ाई लड़  रहा है तो दूसरी ओर उसके अपने ही अपनी पहचान बदलने को आतुर हैं। सुकून देने वाली बात यह कि मप्र के किसी गांव में कम से कम ऐसी स्थिति तो नहीं है।

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** उमा की बेचैनी के मायने

राजनीति की मामूली समझ रखने वाले भी यह कह सकते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती इन दिनों अपने सियासी अस्तित्व की लड़ाई लड रही है। चुनावी बेला ज्यों-ज्यों नजदीक आ रही है,लंबे समय से दायित्वों से वंचित उमा की बेचैनी बढ़ रही हैं।

2003 के बाद 2008 में भी अपनी वजह से भाजपा की सरकार बनवाने का दावा करती रहीं उमा ने अपने परिवार के बाद हाल ही में अपने समाज यानी लोधी वर्ग को भी अपने बंधन से मुक्त करने का ऐलान किया।

वे यह दावा करने से भी नहीं चूकीं कि जिस तरह उप्र में भाजपा वहां के पूर्व मुख्यमंत्री स्व.कल्याण सिंह की तस्वीर दिखाकर  चुनाव में लोधी समाज से वोट मांगती रही,वैसा ही कुछ मप्र में उनके साथ होता रहा है,लेकिन आगे ये नहीं चलेगा।

यही नहीं,हाल ही में छिंदवाड़ा के जामसावली में पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने भगवान श्रीराम व हनुमान की भक्ति के कथित कॉपीराइट का वर्गीकरण भी किया। तो छिंदवाड़ा से अपना पुराना लगाव भी बताया।

कयास यहीं हैं कि उन्हें उनका अधिकार नहीं मिला तो  पुनः वह वर्ष 2006-07 वाला रुख अपना सकती हैं। फर्क इतना है कि पूर्व के कटु अनुभव को देखते हुए तरीका बदला हुआ होगा।

**सीट बदलने को आतुर
प्रदेश में भाजपा के कई विधायक ही नहीं,सांसद भी आगामी चुनाव में अपनी सीट बदलने को लेकर आतुर हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल ने तो सोमवार को अनौपचारिक चर्चा में अपनी यह पीड़ा भी जाहिर करते हुए कहा कि इधर-उधर की जगह अपने गृह क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मौका मिले तो बात अलग है।

देखना है,आगामी चुनाव में उनकी यह इच्छा पूरी होती है या नहीं। पटेल अभी दमोह से सांसद हैं।

** गले पड़ा सर्वे
चुनाव से पहले यूं तो हर प्रमुख दल प्रदेश की नब्ज टटोलने अपने स्तर पर सर्वे करता रहा है।

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ स्वयं ही कई बार सर्वे के आधार पर उम्मीदवार चयन की बात कहते रहे हैं,लेकिन हाल ही में ऐसे ही एक सर्वे के आंकड़े सार्वजनिक होने पर यह गले पड़ने वाला साबित हुआ।

पार्टी के ही दिग्गज नेता व विधायक लक्ष्मण सिंह ने इसे लेकर नेतृत्व को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके बाद सर्वे को लेकर दो दिन तक चुप्पी साधे रहे नाथ को कहना पड़ा  कि पार्टी ने ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया लेकिन तब तक तो हालात जग जाहिर हो ही चुके थे।

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**पहले छेड़छाड़ , अब तमंचे पर डिस्को
कोतमा से कांग्रेस विधायक सुनील सर्राफ अपने पद का जश्न कुछ अलग अंदाज में मना रहे हैं। पहले वह एक महिला यात्री से छेड़छाड़  के मामले में आरोपी बने और अब नए साल का जश्न तमंचे की फायरिंग के साथ मनाने पर।

पिस्तौल भले ही लाइसेंसी हो,लेकिन इसके उपयोग को लेकर भी कुछ नियम-कायदे हैं। मामला तूल पकड़ा तो सर्राफ अब पिस्तौल को खिलौना बता रहें हैं।बहरहाल,चुनावी साल में उनका यह अंदाज उन्हें कितना नफा – नुकसान पहुंचाएगा । यह तो उन्हें टिकट मिलने व चुनावी नतीजे आने पर ही पता चलेगा।

** ‘अभयदान ‘ की उम्मीद से बढ़ी बेफिक्री 
अपने कारनामों से अपनी विधायकी को खतरे में डाल चुके प्रदेश के तीन विधायक अदालती सहारे के अलावा वक्त की मांग को देखते हुए भी बेफिक्र बताए जाते हैं।

दरअसल, दस महीने बाद प्रदेश में आम चुनाव होना है और कोई भी राजनीतिक दल व निर्वाचन आयोग नहीं चाहेगा कि उन्हें इस अवधि में दोहरे चुनाव का सामना करना पड़े । माना जा रहा है कि विधिक सलाह व नोटिस प्रक्रिया के नाम पर कम से कम मई-जून तक तो निर्णय को टाला जाए।

इसके बाद इनकी विधायकी गई भी तो किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है। बड़वाह विधायक इस मामले में पहले ही नजीर बने हुए हैं। दोनों ही दल दावे के साथ इन्हें अपना नहीं कह सकते और निर्दलीय ,वे हैं नहीं । कहते हैं,राजनीति में सब संभव है।

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** अमृत काल का गंभीर चिंतन
बीते पखवाड़े में वोट की राजनीति से परे , गंभीर  विषयों  से जुड़े दो अहम आयोजन हुए। पहला राजधानी में विज्ञान कार्यशाला व अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति  विश्लेषण संस्थान (एग्गपा) द्वारा तैयार सीएम फेलो से संवाद ।

दूसरा उज्जैन में तीन दिवसीय “सुजलाम ” महोत्सव (Photo-महाकाल मंदिर परिसर में जल स्तम्भ का अनावरण एवं महोत्सव को संबोधित करते आरएसएस प्रमुख डॉ मोहन भागवत।) आमतौर पर इस तरह के तकनीकी कार्यक्रम महज रस्म अदायगी तक सीमित  होते हैं लेकिन  इनके तत्काल नतीजे बताते हैं कि आजादी के शताब्दी वर्ष के लक्ष्य को लेकर तैयारी सिर्फ सतही नहीं  बल्कि इसे जमीन पर उतारने पर भी जोर है।

आयोजनों  के तत्काल परिणाम कुछ इस प्रकार सामने आए… नई विज्ञान नीति लाने की तैयारी , जिलों में आंकड़ों की बाजीगरी रोकने व  प्रभारी मंत्री संग समन्वय बनाने सीएम फेलो की तैनाती तो अगले 25 सालों के  विकास का रोडमैप तैयार करने  मंत्री समूहों का गठन।  इसी तरह, सवा दो साल बाद ही सही मिशन कर्मयोगी पर भी नजर ।

वहीं दूसरे  में,  “जल विजन – 2047” को लेकर इसी सप्ताह जल संसाधन विभाग से जुड़े देशभर के मंत्रियों का भोपाल में प्रस्तावित सम्मेलन।

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** पहचान बदलने की तैयारी
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मप्र को नक्सल मुक्त बता चुके हैं. लेकिन बीते कुछ महीनों से नेपानगर व खालवा के जंगलों में अतिक्रमणकारियों की जो गतिविधियां जारी हैं, इन्हें देखते हुआ यह आशंका जाहिर की जाती रही है कि जल्दी ही इस मामले में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो कहीं  सम्बंधित जिलों  की पहचान न बदल जाए। फिलहाल तो अतिक्रमणकारी बेखौफ ,प्रशासन मौन और कटते जंगलों से ग्रामीण त्रस्त हैं ।