बंगाल में सत्ता परिवर्तन से पहले संवैधानिक पेच: राष्ट्रपति शासन की चर्चा तेज

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कोलकाता।

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन से पहले संवैधानिक और राजनीतिक असमंजस की स्थिति बन गई है।

राज्यपाल आर.एन. रवि ने गुरुवार शाम विधानसभा भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी, लेकिन देर रात तक निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पद से औपचारिक इस्तीफा नहीं सौंपा।

इसी बीच भाजपा ने 9 मई को नई सरकार के शपथ ग्रहण का ऐलान कर दिया है। ऐसे में दो दिन के इस अंतराल को लेकर राजनीतिक गलियारों में राष्ट्रपति शासन की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।

विधानसभा भंग, लेकिन इस्तीफा नहीं

राज्यपाल आर.एन. रवि की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत 7 मई 2026 से पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग किया जाता है।

विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने के साथ ही मौजूदा मंत्रिपरिषद स्वतः समाप्त मानी जा रही है। हालांकि सामान्य परंपरा के तहत मुख्यमंत्री तब तक कार्यवाहक भूमिका में बने रहते हैं, जब तक नई सरकार शपथ नहीं ले लेती।

ममता बनर्जी ने अब तक न तो इस्तीफा दिया है और न ही कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर बने रहने को लेकर कोई स्पष्ट संकेत दिए हैं। इससे संवैधानिक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

9 मई को भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण

भाजपा ने भारी बहुमत के बाद 9 मई को नई सरकार के गठन की घोषणा की है।

उसी दिन नए मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को शपथ दिलाई जाएगी।

लेकिन विधानसभा भंग होने और नई सरकार के गठन के बीच बने दो दिन के अंतराल ने राजनीतिक बहस को और गर्म कर दिया है।

राष्ट्रपति शासन पर क्यों हो रही चर्चा?

संवैधानिक जानकारों के मुताबिक यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देते और कार्यवाहक व्यवस्था भी स्पष्ट नहीं होती, तो राज्यपाल केंद्र को रिपोर्ट भेज सकते हैं कि राज्य में संवैधानिक स्थिति अस्पष्ट है।

ऐसी परिस्थिति में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत सीमित अवधि के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करने का विकल्प खुला रह सकता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह स्थिति बेहद असाधारण होगी और संभवतः केवल औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने तक ही सीमित रह सकती है।

चुनाव नतीजों के बाद ही दिए थे संकेत

चुनाव परिणाम आने के अगले दिन ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि उन्हें “अनुचित तरीके से हराया गया” है।

इसी आधार पर उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार किया था।

उनके इसी रुख के कारण अब बंगाल की राजनीति में संवैधानिक टकराव की आशंका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।