प्रदेश में खेती को “लाभ का धंधा” बनाने का दावा करने वाली सरकार अपने ही शासकीय कृषि फार्मों को फायदे में नहीं ला पा रही है।
विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश के 46 सरकारी कृषि फार्मों में से 9 लगातार घाटे में चल रहे हैं।
सवाल उठ रहा है-जब मॉडल फार्म ही लाभ नहीं कमा पा रहे, तो सामान्य किसान के लिए खेती कैसे फायदे का सौदा बनेगी?
5 साल में 8.99 करोड़ खर्च, आमदनी सिर्फ 4.04 करोड़
कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक घाटे में चल रहे 9 कृषि फार्मों पर पिछले पांच वर्षों में 8 करोड़ 99 लाख 86 हजार रुपए खर्च हुए, जबकि आमदनी मात्र 4 करोड़ 4 लाख 90 हजार रुपए रही।
रीवा जिले के तिजनी फार्म में वर्ष 2024-25 में 26.91 लाख रुपए खर्च हुए, जबकि आय सिर्फ 1.52 लाख रुपए रही।
भोपाल जिले के चाचेड फार्म में 42.50 लाख रुपए खर्च कर केवल 17.85 लाख रुपए की आमदनी हुई।
सरकार ने गिनाईं वजहें
किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री एदल सिंह कंसाना ने कांग्रेस विधायक राजन मंडलोई के लिखित प्रश्न के जवाब में बताया कि घाटे के मुख्य कारण हैं:
* मौसम आधारित खेती और प्रतिकूल जलवायु
* प्राकृतिक और मानव संसाधनों की कमी
* बीज व कृषि सामग्री के बढ़े हुए बाजार मूल्य
सरकार का कहना है कि इन कारणों से उत्पादन लागत बढ़ी है और लाभ प्रभावित हुआ है।
2020-21 से लगातार नुकसान
विभागीय जानकारी के अनुसार बालाघाट (किन्ही), शाजापुर (गिरवर), ग्वालियर (महुआखेड़ा), शिवपुरी (रन्नौद), खरगोन (सतराठी) और भोपाल (चाचेड) सहित कई फार्म 2020-21 से लगातार घाटे में हैं।
प्रदेश के विभिन्न जिलों-रीवा, सतना, सीधी, शहडोल, उमरिया, दमोह, छतरपुर, पन्ना, जबलपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा, मंडला, नरसिंहपुर, देवास, रतलाम, नीमच, शिवपुरी, मुरैना, अलीराजपुर, धार, खरगोन, सीहोर, रायसेन, राजगढ़, बैतूल, हरदा और नर्मदापुरम में शासकीय कृषि फार्म संचालित हैं।
बेचने की योजना नहीं
विधानसभा में यह भी पूछा गया कि क्या घाटे वाले फार्मों को बेचने की कोई योजना है। मंत्री कंसाना ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी भी शासकीय कृषि प्रक्षेत्र को बेचने का प्रस्ताव नहीं है।
बड़ा सवाल: मॉडल फार्म से क्या सीख?
सरकारी कृषि फार्मों का उद्देश्य उन्नत तकनीक, बेहतर बीज और आधुनिक पद्धतियों का प्रदर्शन करना है, ताकि किसान प्रेरित हों।
लेकिन जब यही फार्म लागत और आय का संतुलन नहीं बना पा रहे, तो यह कृषि नीति और प्रबंधन दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब निगाह इस पर है कि सरकार घाटे की वजहों को दूर कर इन फार्मों को वाकई “लाभ का मॉडल” बना पाती है या नहीं।