मप्र अजब-गजब: सरकारी के साथ दो राज्यों में निजी विवि भी संभालते रहे प्रोफेसर

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भोपाल।

क्या कोई प्रोफेसर एक शासकीय विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष रहते हुए दो राज्यों के निजी विश्वविद्यालयों में कुलगुरु का दायित्व निभा सकता है?

यह सवाल इन दिनों उच्च शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला विक्रम विश्वविद्यालय से जुड़ा है, जहां के अर्थ साइंस विभाग के प्रोफेसर प्रमोद वर्मा एक साथ कई जिम्मेदारियों में रहे।

31 जनवरी तक तीन-तीन जिम्मेदारियां

विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, प्रो. वर्मा वर्ष 2024 से महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में कुलगुरु के रूप में कार्यरत हैं।।

साथ ही वे छत्तीसगढ़ स्थित महर्षि यूनिवर्सिटी आफ मैनेजमैंट एण्ड टैक्नोलाजी मंगला बिलासपुर  विश्वविद्यालय में भी कुलगुरु का दायित्व निभा रहे हैं।

बताया जाता है कि इस दौरान वह विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में अर्थ साइंस विभागाध्यक्ष के पद पर भी कार्यरत रहे।

विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर अब भी उनका नाम विभागाध्यक्ष के रूप में प्रदर्शित हो रहा है। वहीं,सूत्रों का दावा है कि प्रो.वर्मा  गत 31 जनवरी को ही विक्रम विवि से सेवानिवृत हुए हैं।

अवकाश या प्रतिनियुक्ति? रजिस्ट्रार के बयान में विरोधाभास

इस संबंध में विक्रम विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. अनिल शर्मा ने अलग-अलग बयान दिए।
पहले उन्होंने कहा कि प्रो. वर्मा हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं, लेकिन तारीख याद नहीं है।

निजी विश्वविद्यालय में उनकी नियुक्ति के बारे में उन्होंने कहा कि सक्षम प्राधिकारी (कंपिटेंट अथॉरिटी) ने उन्हें अवकाश स्वीकृत किया था।

बाद में उन्होंने यह भी कहा कि प्रो. वर्मा को प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था। जब उनसे पूछा गया कि क्या इस प्रकार की प्रतिनियुक्ति नियमानुसार है, तो उन्होंने कहा कि सक्षम प्राधिकारी का निर्णय है, इसलिए यह नियमानुसार ही होगा।

शिकायत पहुंची मुख्य सचिव और यूजीसी तक

इस पूरे प्रकरण को लेकर सागर के सामाजिक कार्यकर्ता सुधाकर सिंह ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष तथा छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को ई-मेल के माध्यम से शिकायत भेजी है।

शिकायत में महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में कुलाधिपति और कुलगुरु की नियुक्ति प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।

प्रोफेसर का पक्ष लंबित

इस संबंध में प्रो. प्रमोद वर्मा से व्हाट्सएप संदेश के जरिए उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। संदेश पढ़े जाने के बावजूद कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। उनका पक्ष मिलते ही समाचार में शामिल किया जाएगा।

अब सवाल यह है कि क्या उच्च शिक्षा संस्थानों में एक साथ कई संवैधानिक व प्रशासनिक दायित्व निभाना नियमों के अनुरूप है, या फिर यह व्यवस्था की ढील का उदाहरण? जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।