भोपाल। शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और अव्यवस्था का मुद्दा मंगलवार को विधानसभा में जोरदार ढंग से उठा।
चर्चा के दौरान नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का यह कथन-“सारे कुत्तों से मुझे ही निपटना पड़ता है”-सदन में गूंजा। इस पर पहले ठहाके लगे, लेकिन धीरे-धीरे मामला गंभीर बहस में बदल गया।
ध्यानाकर्षण से छिड़ी बहस
कांग्रेस विधायक आतिफ अकील ने ध्यानाकर्षण सूचना के जरिए राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के शहरी इलाकों में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक का मुद्दा उठाया। जवाब देते हुए मंत्री विजयवर्गीय ने शुरुआत हल्के अंदाज में की—
“अध्यक्ष महोदय, पहला ध्यानाकर्षण और वह भी कुत्तों पर…”
इस पर भाजपा विधायक भंवर सिंह शेखावत ने चुटकी ली—“वह भी कुत्तों पर और जवाब भी कैलाश विजयवर्गीय जी दे रहे।”
तभी विजयवर्गीय ने कहा—“सारे कुत्तों से मुझे ही निपटना पड़ता है…” और सदन में हंसी गूंज उठी।
नसबंदी और खर्च पर तकरार
माहौल तब बदला जब आतिफ अकील ने आरोप लगाया कि कुत्तों की नसबंदी के नाम पर आवंटित राशि का सही उपयोग नहीं हो रहा।
उन्होंने कहा-“नसबंदी पर भी पैसा खा रहे हो… साल के दो करोड़ रुपए मिलते हैं, धरातल पर जाकर देखिए।”
इस पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने टिप्पणी की-“नसबंदी की बात आएगी तो इंदिरा गांधी तक जाएगी।”
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय सिंह ने पलटवार करते हुए कहा—“कुत्तों की नसबंदी की बात हो रही है और आप 40 साल पुरानी बात कर रहे हैं।”
“कुत्तों की जरूरत ही क्या?”
बहस में भाजपा के वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव ने तीखी टिप्पणी की—
“समाज में कुत्तों की जरूरत ही क्या? पालतू हों या आवारा, इनकी नस्ल ही खत्म कर देना चाहिए।”
इस बयान ने सदन में नई चर्चा को जन्म दिया और पशु संरक्षण बनाम जनसुरक्षा का प्रश्न उभरकर सामने आया।
पक्ष-विपक्ष एक सुर में
मामला भले विपक्ष ने उठाया, लेकिन चर्चा में सत्ता और विपक्ष दोनों के एक दर्जन से अधिक विधायकों ने भाग लिया।
सचिन यादव, शैलेंद्र जैन, प्रह्लाद पटेल, विश्वास सारंग, राजेंद्र शुक्ल, सीताशरण शर्मा, अजय विश्नोई, आरिफ मसूद सहित कई सदस्यों ने समस्या के समाधान की जरूरत पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत कार्रवाई
चर्चा के समापन पर मंत्री विजयवर्गीय ने विभागीय जवाब पढ़ते हुए कहा कि सरकार आवारा कुत्तों की समस्या को गंभीरता से ले रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि Supreme Court of India के निर्देशों के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई की जाएगी, ताकि शहरी क्षेत्रों में नागरिकों को राहत मिल सके।
हंसी से शुरू,गंभीरता पर खत्म
सदन में हंसी-मजाक से शुरू हुई यह बहस अंततः जनसुरक्षा, नगर निगमों की जवाबदेही और पशु नियंत्रण नीति जैसे गंभीर सवालों पर केंद्रित हो गई।
अब नजर इस पर है कि सरकार जमीन पर कौन-सी ठोस रणनीति अपनाती है, ताकि आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों पर प्रभावी नियंत्रण हो सके।