अफसरशाही की जंग में​ हारे वैज्ञानिक : MP के कृषि विज्ञान केंद्रों में वेतन के लाले

25

रवि अवस्थी, भोपाल।
अफसरशाही के अड़ियल रवैये ने मध्य प्रदेश के कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) को गहरे संकट में डाल दिया है। प्रदेशभर के 250 से अधिक वैज्ञानिक व प्रशासनिक कर्मचारी बीते दो वर्षों से साल में चार से पांच माह तक बिना वेतन काम करने को मजबूर हैं।

केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य सरकार अपनी-अपनी शर्तों व तर्कों पर अड़ी हैं, जबकि इसकी कीमत केंद्रों में कार्यरत कर्मचारी चुका रहे हैं।

आईसीएआर के सहयोग से प्रदेश में कुल 52 कृषि विज्ञान केंद्र संचालित हो रहे हैं। इनमें से 44 केंद्र जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (JNKVV),जबलपुर के माध्यम से स्थापित किए गए हैं।

इसके अलावा अनूपपुर का केंद्र सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी,अमरकंटक तथा शेष सात केंद्र निजी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित किए जा रहे हैं।

केवल जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े केंद्रों में ही करीब 150 वैज्ञानिकों सहित कुल 228 कर्मचारी कार्यरत हैं। ये सभी केंद्र अलग-अलग वर्षों में स्थापित हुए हैं,लेकिन बीते दो वर्षों से सभी एक जैसी वेतन समस्या से जूझ रहे हैं।

दो साल पहले शुरू हुआ संकट

सूत्रों के अनुसार वर्ष 2023–24 तक स्थिति सामान्य थी। लेकिन 2024 में आईसीएआर ने कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों की पेंशन,जीएसटी और अन्य मदों का भुगतान करने से इंकार कर दिया।

आईसीएआर का तर्क है कि केंद्रों की स्थापना के समय राज्य सरकार के साथ हुए एमओयू में यह स्पष्ट है कि ये कर्मचारी राज्य सरकार के माने जाएंगे और उनकी पेंशन व अन्य देनदारियां राज्य सरकार की जिम्मेदारी होंगी।

आईसीएआर का कहना है कि वह केवल मूल वेतन,महंगाई भत्ता और मकान भत्ता का भुगतान करने के लिए बाध्य है।

राज्य का सवाल-पहले दे रहे थे,अब क्यों नहीं?

वहीं, मध्य प्रदेश कृषि विभाग और जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के अधिकारी एमओयू की शर्तों को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन सवाल उठाते हैं कि जब 2023–24 तक आईसीएआर सभी मदों का भुगतान करता रहा, तो अब अचानक उसे अनुबंध की शर्तें कैसे याद आ गईं।

हाईकोर्ट की दखल,दें पूरा वेतन 

वेतन संकट से परेशान कुछ वैज्ञानिकों व कर्मचारियों ने हाईकोर्ट, जबलपुर में याचिका दायर की। अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए पूर्व की तरह पूरा वेतन देने के आदेश जारी किए। आदेश के उल्लंघन पर अवमानना याचिका भी दाखिल की गई है,जो फिलहाल विचाराधीन है।

विश्वविद्यालय में भी वेतन का  संकट 

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार अखिलेश कुमार जैन का कहना है कि विश्वविद्यालय को राज्य सरकार से मात्र 98 करोड़ रुपये की वार्षिक ग्रांट मिलती है, जबकि अन्य राज्यों में यह ग्रांट 400 से 700 करोड़ रुपये तक है।

सीमित बजट के चलते विश्वविद्यालय अपने नियमित कर्मचारियों को भी पूरे साल का वेतन नहीं दे पा रहा है। पिछले साल केवल 10 माह का वेतन दिया जा सका और इस वर्ष भी हालात कुछ बेहतर नहीं हैं।

जैन के मुताबिक, अदालत के आदेश के अनुसार आईसीएआर से प्राप्त पूरी राशि कृषि विज्ञान केंद्रों को आवंटित की जा रही है, लेकिन तय अनुपात से कम राशि मिलने के कारण साल में केवल कुछ महीनों का ही वेतन दिया जा पाता है।

संविलियन का प्रस्ताव, अनुसंधान पर खतरा

वेतन संकट से निपटने के लिए विश्वविद्यालय ने कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों के संविलियन का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा है। यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो इसका सीधा मतलब होगा—कृषि विज्ञान केंद्रों का बंद होना।

रजिस्ट्रार जैन ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय सभी 228 कर्मचारियों का संविलियन नहीं कर सकता, क्योंकि कई पद सीधी भर्ती के हैं, जिन्हें संविलियन से भरा नहीं जा सकता।

अब शर्तों की दुहाई क्यों ?
** आईसीएआर जबलपुर जोन के निदेशक डॉ. एस.आर.के. सिंह का कहना है कि एमओयू में पेंशन भुगतान न करने की शर्त स्पष्ट रूप से दर्ज है।

आईसीएआर ने दिसंबर 2025 तक की अपनी पूरी देनदारी चुका दी है। शेष जिम्मेदारी कृषि विश्वविद्यालय और राज्य सरकार की है।

** वहीं, राज्य के कृषि विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल का कहना है कि जब दो साल पहले तक आईसीएआर पूरा वेतन देता रहा, तो अब अचानक अनुबंध की शर्तों की दुहाई क्यों दी जा रही है।

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है, ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों को राज्य सरकार का कर्मचारी नहीं माना जा सकता।