राजनेता ही नहीं कवि भी हैं विधायक जयवर्धन सिंह,मप्र की शान पर सुंदर रचना

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रवि अवस्थी, भोपाल।
मध्यप्रदेश की प्राकृतिक समृद्धि, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक पहचान पर जहां गर्व होता है, वहीं जंगलों के कटान, वन्यजीवों की रहस्यमय मौत, नदियों के प्रदूषण और आदिवासी समाज की पीड़ा जैसे सवाल भी बार-बार सामने आते हैं।

इन्हीं विरोधाभासी भावनाओं को शब्द देते हुए राघौगढ़ विधायक एवं पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने प्रदेश की शान और उसके भीतर छिपे कड़वे यथार्थ पर आधारित एक भावपूर्ण कविता और लेख लिखा है, जिसे उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किया है।

जयवर्धन सिंह अपनी रचना में मध्यप्रदेश की भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखते हैं—

“विंध्याचल सा भाल, नर्मदा का जल जिसके पास है,

यहां ज्ञान-विज्ञान-कला का लिखा गया इतिहास है।

उर्वर भूमि, सघन वन, रत्न-संपदा जहां अशेष है,

स्वर-सौरभ-सुषमा से मंडित मेरा मध्यप्रदेश है।”

मध्यप्रदेश गान की प्रिय पंक्तियां

वे कहते हैं कि जब भी प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता पर नजर जाती है, तो मध्यप्रदेश गान की प्रिय पंक्तियां स्वतः मन में गूंज उठती हैं। उनके अनुसार विंध्याचल और सतपुड़ा की पर्वतमालाएं, नर्मदा, ताप्ती, सोन और माही जैसी नदियां तथा उनके बहते जल को देखना अनंत आनंद की अनुभूति कराता है।

नहीं होनी चाहिए लापरवाही

पूर्वी मध्यप्रदेश की यात्रा का जिक्र करते हुए जयवर्धन सिंह लिखते हैं कि घने जंगलों से गुजरते समय ऐसा प्रतीत होता है, मानो प्रकृति ने स्वयं अपनी गोद में समेट लिया हो। उनका सवाल है कि वन्य प्राणियों के लिए इससे बेहतर आश्रय और क्या हो सकता है? ऐसे में जंगलों, नदियों और वन्यजीवों के संरक्षण में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

वे यह भी उल्लेख करते हैं कि वर्ष 2025-26 में मध्यप्रदेश वन विभाग का बजट लगभग ₹4.21 लाख करोड़ है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 981 करोड़ रुपये (लगभग 20 प्रतिशत) अधिक है। इसके बावजूद टाइगरों की अज्ञात मौतें, हिरणों की तस्करी और सागौन की अवैध कटाई जैसी घटनाएं उन्हें गहरी चिंता में डाल देती हैं।

खबरें पढ़कर मन व्यथित हो उठता है

सिंगरौली क्षेत्र में जंगलों की कटाई को लेखक ने सबसे अधिक पीड़ादायक अनुभव बताया है। वहीं ग्वालियर-चंबल से अशोकनगर-गुना मार्ग पर लहलहाते खेत किसान की मेहनत की कहानी कहते हैं, लेकिन अखबारों में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें पढ़कर मन व्यथित हो उठता है।

उज्जैन में महाकालेश्वर के दर्शन से जहां आत्मिक ऊर्जा मिलती है, वहीं शिप्रा नदी का प्रदूषित जल दिल को आहत करता है। इसी तरह पचमढ़ी के धूपगढ़ से प्रदेश की सुंदरता निहारते समय, नीचे उतरते हुए स्थानीय आदिवासियों के जीवन पर निजी कंपनियों के दुष्प्रभाव लेखक को बेचैन कर देते हैं।

मानो ,शरीर पीड़ा से गुजर रहा हो

लेख के अंत में जयवर्धन सिंह भावुक स्वर में कहते हैं कि मध्यप्रदेश उनकी आत्मा, तन और मन में बसता है। उनका जन्म इसी धरती पर हुआ है और एक दिन वे इसी में विलीन होंगे। प्रदेश के साथ हो रही यह उपेक्षा उन्हें ऐसा महसूस कराती है, मानो स्वयं उनका शरीर पीड़ा से गुजर रहा हो।