शुभंकर अध्यक्ष

मप्र बीजेपी अध्यक्ष वीडी शर्मा को प्रदेश में पार्टी का शुभंकर माना जाता है। उन्हें यह गौरव यूं ही नहीं मिला। इसका शगुन तो शर्मा के अध्यक्ष पद संभालने के साथ ही हो गया था। जब पार्टी ने एक नगरीय निकाय में चुनाव जीता। इसके बाद मप्र में चुनाव -दर -चुनाव पार्टी को तो सफलता मिली ही,संगठन भी और मजबूत बनकर उभरा। इसका श्रेय शर्मा की कड़ी मेहनत व कुशल रणनीति को ही जाता है। इसकी तारीफ बीते दिनों सतना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। लोकसभा चुनाव में भी जहां दूसरे दल सीटों की गिनती लगाने में व्यस्त हैं। वहीं बीजेपी प्रत्याशियों के बीच प्रतिस्पर्धा इस बात की,कि कौन कितने अधिक मतों से जीत दर्ज कराएगा।
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बेपरवाह अंदाज

इंदौर में प्रत्याशी के नाम वापसी प्रकरण में तो और भी गजब हुआ कि पार्टी को अंतिम समय तक इसकी भनक ही नहीं लग सकी। साल 2020 में गच्चा खाने पर भी पार्टी ने सबक नहीं लिया। बीते पांच माह में तीन विधायक और हाथ से निकल गए।यह सिलसिला जारी रहा तो अगले विधानसभा चुनाव तक सदन में उसकी सदस्य संख्या कितनी रह जाएगी,इसका सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है।
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परंपरा को आगे बढ़ाया
कहावत है,अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारना। पूर्व मंत्री इमरती देवी को लेकर मप्र कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का बयान इस कहावत को चरितार्थ करता है। ऐन चुनाव के मौके पर उनके बयान ने बीजेपी को हमलावर होने का मौका दिया तो कांग्रेस बैकफुट पर आ गई।अब पटवारी भले ही अफसोस जताएं लेकिन हकीकत यह कि उन्होंने परंपरा को ही आगे बढ़ाने का काम किया है। मप्र में नेताओं के बिगड़े बोलों का जिक्र आने पर ‘आइटम’, ‘सौ टंच माल’ व ’15 साल की किशोरी में प्रजनन क्षमता’ जैसे शब्दों के साथ पटवारी भी ‘रस व चाशनी’ के लिए याद किए जाएंगे।………
यहां जीते तो वहां घाटा
लोकसभा चुनाव बाद विधानसभा की चार सीटों पर उपचुनाव होना तय माना जा रहा है। वहीं पांच और सीटों को लेकर संशय की स्थिति है। ये जीते तो सांसद वर्ना विधायक तो रहना ही है। इसी तरह,राज्यसभा की संभावित रिक्त सीटों को लेकर भी गुणा-भाग शुरू हो गया है। दरअसल,लोकसभा चुनाव में राज्य सभा के 2 सांसद भी मैदान में हैं। और सदन में संख्या बल के मान से बीजेपी के पास दोनों ही सीटों के लिए पर्याप्त बहुमत है। जबकि कांग्रेस 3 विधायक गंवाकर और कमजोर हुई। यानी कांग्रेस लोकसभा में मप्र से एक सीट बढ़ाने में सफल भी हुई तब भी उसे राज्य सभा में एक सीट का घाटा होना तय है।
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मैंने भी कमीशन लिया
राजधानी भोपाल में एक गैस पीड़ित नेता को गैस त्रासदी वर्षगांठ के एक कार्यक्रम में सरकारी नुमाइंदों के साथ मंच साझा करने व माइक पर बोलने का मौका मिला। भाषण के दौरान वह ऐसे भाव-विभोर हुए कि स्वयं को फर्जी गैस पीड़ित बता मुआवजा लेने की बात स्वीकार कर ली।गनीमत है,मंचासीन जिम्मेदारों ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया व बात आई-गई हो गई। बस स्टॉप निर्माण मामले में कमीशन को लेकर ऐसी ही एक स्वीकारोक्ति एक पूर्व मंत्री ने बीते दिनों राजगढ़ की सभा में की। फिलहाल तो चुनाव हैे,लेकिन इसके बाद किसी ने उनकी बात को गंभीरता से ले लिया तो बैठे-ठाले जांच के दायरे में आ जाएंगे नेता जी? इसलिए ही कहा गया - तोल,मोल कर बोल।
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यह भी खूब रही
राजधानी के सरकारी अस्पताल में पदस्थ रहे एक एलोपैथी चिकित्सक का जोर मरीज के एलोपैथिक इलाज से ज्यादा उसे योग से स्वस्थ करने पर रहा। यहां तक कि कई बार तो वह मरीजों को दवाइयां बाद में लिखते,पहले मौके पर ही स्वयं योग कर उन्हें स्वस्थ रहने के तरीके सिखाते। नतीजतन,कई महिला मरीजों ने उनसे किनारा कर लिया। ऐसा ही हाल भोपाल से चुनाव लड़ रहे एक प्रत्याशी का है। प्रत्याशी को तलाश रहती है कि कोई मिल भर जाए। वह उसे अपनी कॉन्सेप्ट समझाकर ही छोड़ते हैं। प्रचार में कोई लाव-लश्कर नहीं,बस वह और उनका सुरक्षा कर्मी।पहले चाय पर कुछ लोगों के घर पहुंचकर अपनी प्लानिंग बताई।यह कम हुआ तो अब मॉर्निंग वॉक के दौरान ही राह चलते को अपनी योजना बता रहे हैं।
















