Bhopal,सत्ता के गलियारे से…रवि अवस्थी**’जय’कौन और’वीरू’कौन?
वर्ष 1975 में रिलीज हुई बॉलीवुड की सर्वाधिक पसंदीदा फिल्म शोले के निर्माण को लेकर भी कई किस्से हैं। इसके प्रमुख दो किरदारों की ही बात करें तो फिल्म में जय बने अमिताभ ने शोले का फिल्मांकन शुरू होने से चंद दिन पहले ही जया से शादी कर ली थी। फिल्म रिलीज होने के चंद माह बाद ही अभिषेक का जन्म हुआ। इधर,वीरू बने धर्मेंद्र भी फिल्म निर्माण के दौरान इश्क में ऐसे डूबे कि बाद में उन्होंने हेमा से शादी कर ली। इन कारणों से फिल्म निर्माण लंबा खिंचता गया।
आजकल,मप्र की चुनावी सियासत में शोले की एंट्री ने फिल्मी रंग घोल रखा है। जय,वीरू भी तय हो गए और गब्बर भी। सिर्फ हाथ कटवाने वाले’ठाकुर’ के साथ ही इस बात का खुलासा होना बाकी है कि जय कौन और वीरू कौन? गब्बर को लेकर तो तय है कि फिल्म में यह चरित्र ग्वालियर,चंबल बीहड़ के तत्कालीन डकैत गब्बर पर आधारित रहा है।
** फिल्मी सियासत कर फंसे सुरजेवाला
मप्र कांग्रेस प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने कमलनाथ,दिग्विजय सिंह को जय,वीरू की उपमा क्या दी,बीजेपी की तो जैसे बांछे खिल गई। चुनाव के वक्त पर आरोपों की जगह इस फिल्मी सियासत का बीजेपी ने खूब फायदा उठाया। पलटवार में जय,वीरू प्रसंग से शुरू सियासत फिल्म ‘मेरे अपने’ के ‘श्यामू’व ‘छैनू’तक जा पहुंची।
वहीं,केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खुद को कांग्रेस के लिए काला कौआ तक बता दिया। हालांकि इसका खुलासा नहीं हुआ कि यह कौआ 1973 की बॉबी फिल्म के गाने वाला है या 1998 में आई हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म झूठ बोले कौआ काटे वाला।
बहरहाल,महज एक बयान से फिल्मी होते जा रहे चुनाव पर कांग्रेस को कहना पड़ा कि बंद करो अब यह जय,वीरू…। जवाब पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दिया। राजनीति में खेल जो शुरू करता है,बंद करने का अधिकार उसे नहीं। बंद करेंगे तो हम। यह संकेत हैं कि बीजेपी इस मुद्दे पर 70 एमएम गेज वाली फिल्म बनाने की तैयारी में है। शायद यही वजह है कि रतलाम पहुंचे पीएम मोदी भी इस सियासत का हिस्सा बनने से नहीं चूके और कांग्रेस नेताओं को फिल्मी किरदार बता गए।
** खींची बड़ी लकीर
मुंह में शक्कर,पांव में चक्कर और माथे पर बर्फ। इसे सफल राजनीति का मूल मंत्र माना गया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एक बार पुन: इस मंत्र पर अमल कर अपनी पार्टी को ही बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया। नतीजतन,चाहे-अनचाहे,मौजूदा चुनाव शिवराज वर्सेज कमलनाथ बन गया है।यह लकीर का मिटाए बिना बड़ी लकीर खींचने जैसा है।
चार बार के मुख्यमंत्री होने के बावजूद उपेक्षा का यह भाव! कोई और होता तो बगावत से भूचाल ला देता,लेकिन यह शिवराज हैं। जो धैर्य के मल्हम से’दंश’की पीड़ा को बिसराते हुए अपने शौर्य को लगातार बढ़ा रहे हैं। वहीं,इसी दल की एक फायर ब्रांड नेत्री हैं जो अपने शौर्य का हवाला देकर धैर्य की परीक्षा के लिए ईश्वर को जिम्मेदार बता रही हैं।
** बोलें,बताएं,पर तोल-मोल कर
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने मूल काम से ज्यादा अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले राजनेताओं में एक हैं। एक बार वह फिर पाकिस्तान के एक वीडियो को भारत का बताकर सोशल मीडिया पर ट्रोल हो गए। मौसम चुनाव का है तो जाहिर है,बीजेपी नेताओं को भी दिग्विजय पर निशाना साधने का मौका मिल गया।
इससे पहले भी वह पाकिस्तान के एक वीडियो को भोपाल के पुल का और बिहार के एक वीडियो को खरगोन के धार्मिक स्थल का बताकर बीजेपी के निशाने पर रह चुके हैं। कई बार तो ऐसा हुआ जब पार्टी को उनके बयानों से किनारा कर उन्हें समझाइश देनी पड़ी की बोलें,बताएं,लेकिन तोल-मोल कर। यूं भी कहा गया है कि आलोचना तथ्यात्मक हो तो ठीक,वर्ना विश्वसनीयता खतरे में रहती है।
** “न ख़ुदा ही मिला,न….”
‘न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम..’। यह शेर चुनावी टिकट की आस में सरकारी नौकरी गंवाने वालों पर सौ फीसद खरा उतरता है। एक आइएएस समेत कुछ नाम ऐसे हैं,जो उस दिन को कोस रहे हैं जब राजनेताओं की बातों में आ गए। अब जबलपुर में थानेदार रहे नेपानगर के बिलार सिंह को ही लीजिए। नेपानगर सीट पर कांग्रेस से टिकट की उम्मीद में वह अपनी रुआबदार नौकरी छोड़ बैठे।
वर्ष 2018 बैच की डिप्टी कलेक्टर निशा बांगरे। न इधर की रहीं,न उधर की। गुढ़ सीट से भाग्य आजमा रहे,आप पार्टी के प्रत्याशी आर्किटेक्ट प्रखर प्रताप सिंह अमेरिका में एक करोड़ रुपए पैकेज की नौकरी छोड़ आए। अलबत्ता,जबलपुर मेडिकल कॉलेज में चिकित्सक रहे,डॉ विजय आनंद मरावी व 27 वर्षीय इंजीनियर शिवराज कन्नौज इस मामले में भाग्यशाली रहे। एक अब बिछिया तो दूसरा मनावर से बीजेपी के प्रत्याशी हैं।