सत्ता के गलियारे से…रवि अवस्थी
** किसकी’कमीज’ज्यादा सफेद
टिकट वितरण का दौर है तो वंचित दावेदारों का’सिर उठाना’लाजिमी है। क्या बीजेपी,क्या कांग्रेस?दोनों में ही सिर फुटौव्वल हुई,और खूब हुईं।अलबत्ता,बीजेपी ने बगावत को नजरअंदाज किया तो वहां मामला जल्दी शांत हो गया। कांग्रेस दबाव में आ गई। पहली सूची में तीन टिकट बदले तो दूसरी सूची के वंचितों की भी उम्मीद जाग उठी। चार तो इसमें सफल भी हुए।अब भी कई उम्मीद से हैं। बहरहाल,इस अदला-बदली के बीच जो हुआ,उसने पार्टी की छवि को तार-तार कर दिया। आंखों की शर्म व अनुशासन खूंटी पर टंगा नजर आया। ज्यादा फजीहत,दोनों दलों के प्रवक्ताओं की हुई,जो एक-दूसरे की’कमीज’ के दाग गिनाते हुए अपनी पार्टी को ज्यादा सफेद बता रहे हैं।
** फर्क तो है
अब यह मजबूरी है या जरूरी है,यह तो कांग्रेस के रणनीतिकार ही जानें..लेकिन यह तय है कि पहले उसने जिन्हें पहले दागदार बताकर टिकट से वंचित किया। उग्र बगावत के बाद उन्हें पुन: प्रत्याशी बनाना पड़ा। बगावत के बाद सुमावली से प्रत्याशी बनाए गए अजब सिंह कुशवाह पर सरकारी जमीन का ही सौदा कर दिए जाने जैसे गंभीर आरोप रहे। इसमें उन्हें दो साल की सजा भी सुनाई गई थी। ऐसे ही एक अन्य मामले में बीते माह फरियादी के पलटने पर न्यायालय ने जरूर बरी किया। बड़वानी विधायक के बेटे पर लगे आरोप जगजाहिर हैं।जावरा से घोषित प्रत्याशी वीरेंद्र सोलंकी को तो बीते साल पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते कांग्रेस ने ही 6 साल के लिए निष्कासित किया था। इधर,सीधी का पेशाब कांड हो,भिंड का पटवारी परीक्षा मामला या फिर इंदौर के बैट मार विधायक,तीनों को बाहर का रास्ता दिखाकर,बीजेपी अपने स्टैंड पर कायम रही।अब तीन दिनी मप्र प्रवास के दौरान अमित शाह संभागीय स्तर की बैठकें कर एक बार फिर बागियों को आइना दिखाने का काम कर रहे हैं।
** बड़ी लाइन खींचने की कवायद
सक्रियता व जनता से जीवंत संपर्क सफल राजनीति का मूल मंत्र है। इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कोई सानी नही।परिस्थितियां कैसी भी रहीं हों,जनता के बीच बने रहना जैसे उनका शगल है।सहजता और संयम तो जैसे उनमें कूट-कूट कर भरा है। यही उनकी लोकप्रियता की बड़ी वजह भी है। बहरहाल,चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही जिम्मेदारी बढ़ी तो शिवराज बिना देर किए पार्टी के काम में जुट गए। बीजेपी के अन्य नेताओं को जहां स्टार प्रचारक सूची का इंतजार रहा। वहीं शिवराज इसकी प्रतीक्षा किए बिना मैदान में हैं। अलबत्ता,चुनावी सभाओं में इस बात का जरूर ध्यान रखा जा रहा है कि’लाड़ली बहनों’की संख्या अधिकाधिक हो।सभाओं की यही भीड़ बताएगी कि पार्टी में ‘मास्टर स्ट्रोक’किसका चला। शनिवार को उनका एक और रूप दिखा। जब बुरहानपुर की एक सभा से पहले वह ग्रामीण महिलाओं के साथ जमीन पर बैठकर भाजी-रोटी खाते दिखे। किसी गरीब के पैर धोने का मामला हो या जमीन पर बैठ भाजी-रोटी खाने का,यह काम सिर्फ शिवराज ही कर सकते हैं।
** प्रचार से दूर भूरिया
कांग्रेस ने भी दो माह पहले 34 सदस्यीय चुनाव अभियान समिति का गठन किया। प्रदेश के कद्दावर आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया इसके अध्यक्ष बनाए गए। पार्टी में टिकट वितरण हो या प्रचार का मामला,भूरिया का नाम लगभग हर जगह से गायब है। यानी उनका पद व भूमिका सिर्फ समिति गठन के आदेश तक सीमित कर दी गई। गनीमत,कि स्टार प्रचारकों की सूची में उन्हें जगह मिल गई। भूरिया को भी अपनी पार्टी की कार्यशैली का लंबा अनुभव है। इसके चलते उन्होंने न तो अपनी उपेक्षा को लेकर कभी कोई सवाल उठाए न ही खुद को अलग से प्रचारित करने का जोखिम ही उठाया। यूं भी,भूरिया ‘न काहू से दोस्ती,न काहू से बैर’ यानी शांत स्वभाव वाले राजनेता हैं।
** मार्गदर्शक मंडल की परेशानी
बीजेपी के कई बुजुर्ग नेता कथिततौर पर मार्गदर्शक मंडल में हैं,लेकिन इनकी परेशानी है कि ऐसे क्रूशियल समय में भी उनकी पूछपरख नहीं है। अपनी मुखरता के लिए पहचाने जाने वाले 81वर्षीय रघुनंदन शर्मा तो मीडिया के समक्ष इस पीड़ा को उजागर करने से भी नहीं चूके। बाकी घर या हिमालय में बैठे ‘तेल और तेल की धार’माप रहे हैं। इनकी बड़ी चिंता’राष्ट्रवादी विचारधारा’के संभावित खतरे को लेकर है। इधर,चुनाव की बागडोर कनेक्शन बदलते ही बागियों को लेकर प्रदेशस्तरीय नेता भी बेफिक्र बने हुए हैं। जिन्हें बागियों को मनाने आगे आना था,वे दूसरे की बला अपने सिर लेने के मूड में नहीं।
**आश्वासन के भरोसे निशा
राज्य प्रशासनिक सेवा की 2018 बैच की अधिकारी सुश्री निशा बांगरे का इस्तीुफा अंतत: मंजूर हो गया। तब जब कांग्रेस ने आमला से मनोज माल्वे को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। पहले,इस्तीफे का अटकना फिर इधर,प्रत्याशी घोषित,उधर इस्तीफा मंजूर। प्रशासनिक क्षेत्र से राजनीति में कदम रख रही निशा को सियासत के इन दांवपेंच को समझने में लंबा अरसा लगेगा। फिलहाल तो वह एक और आश्वासन के भरोसे हैं। वह है,टिकट के लिए प्रयास का।
** सरगर्म है फेक वीडियो का बाजार
चुनाव के दौर में झूठ का बाजार भी सरगर्म होता है। सार्वजनिक मंच के साथ ही सोशल मीडिया पर भी धड़ल्ले से झूठ बोला जा रहा है। मतदाता के लिए नीर,क्षीर का भेद करना मुश्किल हो रहा है। नेताओं के साथ ही राजनीतिक दलों की सोशल मीडिया टीम भी बखूबी अपना काम कर रही है।धड़ल्ले से राज्यवार फेक वीडियो परोसे जा रहे हैं। मप्र की ही बात करें तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,फेक वीडियो बनाने वालों की पहली पसंद हैं। शिवराज की लोकप्रियता इसकी बड़ी वजह हो सकती है,लेकिन हैरत की बात यह कि कई प्रतिद्वंदी नेता व धुर विरोधी इन फेक वीडियो से गच्चा खा जाते हैं व अपनी प्रतिक्रिया जता,हंसी का पात्र बनते हैं।खास बात यह,कि चुनाव आयोग भी सोशल मीडिया के इस फेक’जिन्न’को काबू में नहीं कर पा रहा है। आचार संहिता उल्लंघन को लेकर इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया से जुड़े सवाल पर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी अनुपम राजन को भी कहना पड़ा कि सिर्फ कागजी निर्देशों से ज्यादा कुछ होने वाला नहीं।अपनी’क्रेडिबिलिटी’के लिए असल मीडिया को ही आगे आना होगा।
** आतिशबाजी का इंतजार
सतयुग के रावण ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कलयुग में उनसे भी बड़े’विलेन’होंगे। गुना में अपने जलने की बारी कर रहे’रावण’को उस वक्त निराशा हुई जब अज्ञात चोर उनके दहन की सामग्री यानी करीब 34 हजार के पटाखे ही ले उड़े। महंगाई के इस दौर में आयोजकों के लिए यह वारदात,”दूबरे और उस पर दो आषाढ़” वाली साबित हुई। बहरहाल,’रावण’की आत्मिक शांति के लिए इन्होंने जैसे-तैसे दूसरे पटाखों की व्यवस्था की। तब कही पुतला दहन हो सका,लेकिन लोगों के मनोरंजन में खलल डालने वाला असल’रावण’अब भी पुलिस की गिरफ्त से दूर है। पुलिस अब तीन दिसंबर की आतिशबाजी का इंतजार कर रही है।
















