मप्र:विधानसभा चुनाव को लेकर मची आपाधापी

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सत्ता के गलियारे से …रवि अवस्थी
** लेकिन अब वक्त नहीं : थोकबंद तबादले तो सुने,लेकिन थोक में राज्यस्तरीय भूमि पूजन,शिलान्यास कार्यक्रम हाल ही में पहली बार ​देखा गया। जब भोपाल से ही हजारों करोड़ के 14 हजार से अ​धिक विकास कार्यों के लिए आधारशिला रख दी गई। ऐसे उदाहरण देश में विरले ही देखने को मिलते हैं।वाकई मप्र अद्भुत प्रदेश है। कई रिकॉर्ड्स के धनी इस प्रदेश के नाम थोकबंद भूमिपूजन का भी रिकॉर्ड दर्ज हो गया। दरअसल,कुछ घंटों बाद ही प्रदेश में चुनाव का लेकर आदर्श आचार संहिता लागू होने को है,लेकिन इसका भय सत्ता पक्ष को बीते दो-तीन दिन से अधिक सता रहा है। इसके चलते इस अद्भुत कार्य को अंजाम दिया गया। इसे लेकर सोशल मीडिया पर एक मीम भी चर्चा में रहा,कि और कहां-कहां भूमिपूजन होना है?बता दें,अब भी वक्त है। वर्ना बाद में पछताना न पड़े!

** मुख्यमंत्री पद के एक और दावेदार
फिलहाल तो ‘दिल्ली दूर’ है,लेकिन इस बार कैडर बेस बीजेपी में फ्री फॉर आल की स्थिति बनने से अगली पारी में सीएम पद के दावेदारों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। विधानसभा चुनाव में आठ बड़े चेहरे उतारे जाने से पुराने भी सोच रहे हैं,हम क्यों पीछे रहें। हाल ही में प्रदेश के वरिष्ठ विधायक एवं मंत्री ने भी गुरुवाणी का संकेत बताकर अपना दावा ठोंका। उन्होंने कहा कि गुरूजी का आदेश है कि मैं एक चुनाव और लड़ूॅं।अपने दावे में भार्गव यह कहने से भी नहीं चूके कि मैं तो बतौर नेता प्रतिपक्ष 108 विधायकों का नेता रह ही चुका हूं तो आगे 116+ का क्यों नहीं हो सकता? भार्गव ने कहा कि जब गुरूजी ने कोई बात कही तो हो सकता हस्तरेखा प्रबल हों और मुझे भी मौका मिल जाए..

** मालवा भी नेतृत्व की होड़ में
इधर,इंदौर एक से प्रत्याशी बनाए गए पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री वही हैं। पहली प्रतिक्रिया में चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा जता चुके,विजयवर्गीय ने कहा कि मैं सिर्फ विधायक बनने चुनाव मैदान में नहीं। अगले बयान में उन्होंने कहा कि भोपाल से एक इशारा करूंगा और मेरे विधानसभा क्षेत्र में काम हो जाएगा। टिकट मिलने से पहले विजयवर्गीय पार्टी अध्यक्ष का हवाला देकर कह चुके हैं कि वह मुझे बनाना तो बहुत कुछ चाहते थे लेकिन फिलहाल अभी और इंतजार किया जाए। खुले तौर पर तो नहीं,लेकिन उनके हाल के भाषण यह बताने के लिए काफी हैं कि शीर्ष नेतृत्व की ओर से उन्हें हरी झंडी पहले ही मिल चुकी है। इंतजार सिर्फ चुनाव परिणाम का है। विजयवर्गीय के अलावा फग्गन सिंह कुलस्ते,प्रह्लाद पटेल भी कुछ इसी तरह के संकेत,अपने मतदाताओं को दे रहे हैं। अलबत्ता चुनाव संयोजक नरेंद्र सिंह तोमर ने अपने स्वभाव के मुताबिक अब तक अपने पत्ते नहीं खोले।** चाहिए गंभीर दृष्टि
चुनाव आचार संहिता से पूर्व आम जनता से चुनाव लड़ने की अनुमति व अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड मांगकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी जता दिया कि मैदान में वह भी हैं। यही नहीं,उनका यह कथन कि दुबला-पतला सही लेकिन लड़ने में पीछे नहीं। जाहिर है,चुनाव में मास्टर स्ट्रोक्स तो उन्हीं के कारगर रहने वाले हैं। इन्हीं से नैया पार होने की उम्मीद भी है। ऐसे में शिवराज भला क्यों मैदान छोड़ें? जनता से संवाद के बहाने उन्होंने नेतृत्व को संकेत दे ही दिए हैं।
** चुनाव की तैयारी में मुरलीधर
तेलंगाना मूल के पोलसानी मुरलीधर राव, यानी मप्र बीजेपी के प्रभारी। जो वर्ष 2021 में ब्राह्मण,बनियों को पार्टी की जेब में रहने जैसा बयान देकर अधिक सुर्खियों में रहे। चुनाव के वक्त जब पार्टी प्रदेश प्रभारी की भूमिका अहम होती है,राव का नाम सुर्खियों से लगभग गायब है।

यूं भी जब किसी चुनाव व संगठन को लेकर आधा दर्जन से अधिक वजनदार प्रभारी सक्रिय हों तो इकाई प्रभारी के लिए कुछ अधिक करने व कहने सुनने को नहीं रह जाता,लेकिन राव के साथ ऐसा नहीं है। बताया जाता है कि पार्टी मप्र के साथ ही होने जा रहे तेलंगाना चुनाव में बड़ी भूमिका देने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि पार्टी उन्हें तेलंगाना के सिद्दीपेट विधानसभा सीट से वहां के वित्त मंत्री टी हरीश राव के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार सकती है।

वरिष्ठ नेताओं को विधानसभा चुनाव लड़ाने को फॉर्मूला तेलंगाना में भी लागू किया जाना है,लेकिन टिकट से पहले ही वहां इसके खिलाफ विरोध के स्वर उभर रहे हैं। तेलंगाना में सत्तारूढ़ बीआरएस के परफॉर्मेंस को देखते हुए इसे आत्मघाती कदम माना जा रहा है। असफलता पर पार्टी ने लोकसभा में अवसर दिए जाने की बात भी कही है। ऐसा हुआ तो राव लोकसभा चुनाव में भी भाग्य आजमाते नजर आएंगे।

** आड़े आया श्राद्ध पक्ष
मप्र बीजेपी को विधानसभा उम्मीदवारों की चौथी तो कांग्रेस को पहली सूची का इंतजार है। बताया जाता है कि उम्मीदवारों की घोषणा में कड़वे दिन यानी श्राद्ध पक्ष आड़े आ रहा है। इसके चलते संभावना यही​ कि सूची नवरात्र में ही जारी हो। बीते चुनाव में बीजेपी व कांग्रेस ने इसी पक्ष में अपने उम्मीदवार घोषित किए,लेकिन अनुभव दोनों दलों के अच्छे नहीं रहे।

एक सत्ता से बाहर हो गया तो दूसरे ने 15 साल बाद वापसी की लेकिन 15 महीने में ही बाहर भी हो गए।श्राद्ध पक्ष में प्रत्याशियों की घोषणा से बचने के मानस को अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दो दिन पहले मीडिया एंड कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के चेयरमैन पवन खेड़ा ने देर शाम सूची आने की बात कही तो पार्टी प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ को मजबूरन यह कहना पड़ा कि सूची के लिए अभी 6-7 दिन और इंतजार करना होगा।

** डगर नहीं आसान
ब्यूरोक्रेटस व सत्तासीन राजनेताओं का चोली दामन सा नाता है। इसके चलते कई अधिकारी सियासत की चकाचौंध से प्रभावित होकर राजनीतिक दलों का दामन भी थामते रहे हैं। फर्क इतना है कि कुछ ने सेवानिवृत्ति के बाद तो कुछ ने पद से त्यागपत्र देकर यह कदम उठाया। बीते एक दशक के दौरान ही दर्जनभर से अधिक अधिकारियों ने किसी न किसी दल का दामन थामा।

यह अलग बात है कि ज्यादातर का रुझान बीजेपी की ओर रहा। हर राज्य में ऐसे अधिकारियों की एक लंबी फेहरिस्त है। मौजूदा चुनाव की बात करें तो छत्तीसगढ़ से 2008 बैच के आइएएस अधिकारी नीलकंठ टेकाम,मप्र में 2003 बैच के अधिकारी राजीव शर्मा का नाम चर्चा में है। जो इस फेहरिस्त में शामिल होने जा रहे हैं। टेकाम ऐलान कर चुके हैं,शर्मा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सियासत में अधिकारियों के भविष्य की बात करें तो चंद ही सफलता की सीढ़ी चढ़ सत्ता का स्वाद चख पाए। कुछ ऐसे भी हैं जो सितारे बनकर चमके।

** इन्हें बेसब्री से इंतजार
चुनाव आदर्श आचार संहिता यूं तो चुनाव मैदान में उतरने वाले राजनीतिक दलों,प्रत्याशियों से जुड़ा मामला है,लेकिन एक और तबका है जिसे इसका बेसब्री से इंतजार होता है। वह है,आए दिन के नए नए कार्यक्रमों,योजनाओं व दौरों से आजिज आया मैदानी प्रशासनिक अमला।

इनका एक ​एक दिन गिनते हुए गुजर रहा कि कब चुनाव कार्यक्रम घोषित हों और उन्हें इस बेगारी से निजात मिले। दरअसल,मैदानी स्तर पर भी कर्मचारियों का टोटा है और कामकाज का दबाव इतना कि सांस लेने की फुर्सत नहीं। बहरहाल,आज दोपहर बाद अब मैदानी ही नहीं मुख्यालयों के अधिकारी,कर्मचारी भी दो महीने तक चैन की सांस ले सकेंगे।