सत्ता के गलियारे से…..रवि अवस्थी
व्यक्तित्व का परिचय,व्यक्ति के कर्म और वाणी से होता है। सुसंस्कारित व्यक्तित्व इसमें अहम भूमिका अदा करता है। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है। ‘मुंह में शक्कर,पांव में चक्कर। सीने में आग और माथे पर बर्फ।।’ वाले एक कुशल राजनेता के गुण तो उनमें हैं ही। उनका चिंतन स्वामी विवेकानंद से प्रेरित है। अध्यात्म में भी उनकी गहरी रुचि है।
ओंकारेश्वर के मांधाता पर्वत पर आकार लेता अद्वैत वेदांत संस्थान इसका प्रमुख उदाहरण है। जिसकी कार्ययोजना उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में ही यानी 2017 में बना ली थी। विभिन्न धार्मिक लोकों की परिकल्पना भले ही विचारधारा विशेष की कार्ययोजना का हिस्सा हो लेकिन आदि शंकराचार्य की स्मृति व दर्शन की पुनर्स्थापना,शिवराज के आध्यात्मिक चिंतन का ही नतीजा है।कोरोनाकाल सहित तमाम बाधाएं व अपेक्षित सियासी सहयोग नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने मांधाता पर्वत को एक आध्यात्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर वाकई इतिहास रचने का काम किया है।इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं।
** कार्पोरेट कल्चर की झलक
समय की पाबंदी,भीड़ से दूरी,दो टूक बात और अनुशासन,यह कार्पोरेट व ब्यूरोक्रेसी कल्चर का अहम हिस्सा है। इसके इतर राजनीति में यह सब बातें कोई अधिक मायने नहीं रखतीं। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ एक मंझे हुए राजनेता होने के साथ ही एक नामचीन उद्यमी भी हैं। केंद्र की सियासत में भी उनका ज्यादातर वक्त पार्टी के प्रबंधन से जुड़े कामों में गुजरा,लेकिन क्षेत्रीय राजनीति इसके उलट है। यहां एक छोटे से छोटा कार्यकर्ता भी अपने मुखिया से सीधे जुड़ाव की अपेक्षा रखता है।
नाथ को प्रदेश में पार्टी की बागडोर संभाले करीब छह साल से अधिक समय हो चुका है,लेकिन वह अब तक कार्पोरेट कल्चर शैली से उबर नहीं सके। सियासी भाषण हो या बयानबाजी,बिना लाग लपेट के दो टूक बात कहने से उन्हें गुरेज नहीं। इसी तरह,दिल में मीडिया के प्रति सम्मान लेकिन बेवक्त की दखलंदाजी पर आइना दिखाने में भी वे परहेज नहीं करते। लिहाजा इंदौर का घटनाक्रम हो या मीडिया का ठेका प्रतिद्वंदी दल के नेता को दिए जाने वाला बयान,इसे उनके दर्प से नहीं जोड़ा जा सकता।अब कौन नेता ऐसा होगा जो कहे,कि आप मुझे वोट मत दीजिए,पार्टी को मत दीजिए,लेकिन इस प्रदेश के भविष्य के लिए सच्चाई का साथ अवश्य दीजिए। ऐसी दो टूक बात सिर्फ कमलनाथ ही कह सकते हैं। यही उनकी शैली है। जरूरत सिर्फ उनकी मंशा व भाव को समझने की है।
** अब तीसरे राज्य पर नजर
पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती लंबे समय से अपना नया मुकाम पाने के लिए प्रयासरत हैं। गृह राज्य में संभावनाएं धूमिल देख अब उनकी नजर तीसरे राज्य पर है। शनिवार को एक बयान में उन्होंने इसके संकेत भी दिए। संभवतया उनका इशारा पड़ोसी राज्य राजस्थान को लेकर हैं। राजस्थान के चुनावी ट्रेंड को देखते हुए बीजेपी को इस बार अपनी सरकार बनने की पूरी उम्मीद है। लेकिन बड़ी चुनौती है, प्रदेश इकाई की गुटबाजी। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री से केंद्रीय नेतृत्व पहले ही नाराज बताया जा रहा है। यदि उमा का दांव सफल रहा तो संभव है कि पड़ोसी राज्य में भी मप्र का दबदबा बढ़ जाए। राजनीति में सब कुछ संभव है।
** उलटफेर के आसार
खजाना पूरी तरह खोलने के बाद भी मतदाताओं का रुझान अब तक साफ नहीं है। विरोध सरकार का कम,व्यक्तिगत ज्यादा है। इसके चलते सत्तारुढ़ दल का फोकस अब वोट शेयर से ज्यादा सीटों की संख्या बढ़ाने पर है। इसके लिए जिताऊ चेहरों पर अधिक जोर है। इस कवायद में ‘पूरे घर के बदलने वाले’ अंदाज में कई मौजूदा विधायकों को घर बैठाकर नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। इनमें राजनीति से अब तक दूर रहे चेहरे भी शामिल हो सकते हैं। बताया जाता है कि एक मौजूदा संभागायुक्त भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। वहीं नौकरी छोड़ने के लिए बेचैन एक महिला अधिकारी को भी पार्टी अपने पाले में लाकर मौका दे सकती है। बहरहाल,लहर व मुद्दा विहीन यह चुनाव कई मायनों में रोचक रहने वाला है।
** पीएचडी वाले आईएएस
प्रदेश में पदस्थ,मप्र कैडर के मौजूदा 389 (प्रतिनियुक्ति को छोड़कर)आईएएस में 17 अधिकारी डॉक्टरी पेशे को छोड़ प्रशासनिक सेवा में आए। इनकी अतिरिक्त विशेषज्ञता की बात करें तो इनमें दो एम.डी.,10 एमबीबीएस,एक-एक वेटेरनरी व बीडीएस डिग्री धारक हैं। जबकि पीएचडी वाले डॉक्टर्स सिर्फ तीन लेकिन यहां बात हो रही है एक ऐसे अधिकारी की जिनके नाम के आगे भले ही डॉ. न लगा हो लेकिन उनकी लेखन प्रतिभा से प्रेरित होकर विद्यार्थी अब उन पर शोध कर रहे हैं। ये हैं,शहडोल संभाग के मौजूदा कमिश्नर राजीव शर्मा। वर्ष 2003 बैच के आईएएस अधिकारी श्री शर्मा एक नामचीन लेखक भी हैं। आदि शंकराचार्य पर आधारित उनकी पुस्तक ‘विद्रोही सन्यासी’ विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है और इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। शर्मा अलग-अलग विषयों पर अब तक 7 पुस्तकें लिख चुके हैं। जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुछ छात्रों ने विधिवत अनुमति के साथ श्री शर्मा के लेखन पर शोध शुरू भी कर दिया है।
शर्मा एक कुशल व लोकप्रिय प्रशासक भी हैं। शाजापुर कलेक्टर रहते जिले के होनहार व जरूरतमंद बच्चों के लिए पीएससी कोचिंग की नि:शुल्क व्यवस्था कराई तो बतौर कमिश्नर,शहडोल जैसे आदिवासी अंचल में फुटबाल क्रांति लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है। उनके इस प्रयास को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में सराहा। जाहिर है,कुछ अलग करने की इच्छाशक्ति हो तो प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी समाजहित में बहुत कुछ किया जा सकता है।
** फेल होने की चाहत!
शायद ही कोई ऐसा हो जो किसी परीक्षा में जानबूझकर फेल होना चाहे? लेकिन मप्र में एक परीक्षा ऐसी भी जिसमें हर छोटी-बड़ी बात में नुक्स निकालने वाले अधिकारी भी पास नहीं होना चाहते..यह है चुनाव आयोग की रिटर्निंग व सहायक रिटर्निंग अधिकारी पद के लिए परीक्षा।इस पद के लिए जिम्मेदारी तय करने से पूर्व आयोग संबंधित अधिकारियों की योग्यता परखने की औपचारिकता निभाता रहा है। इस बार भी यह परीक्षा 15 सितंबर को आयोजित की गई। बताया जाता है कि पिछले अनुभव को देखते हुए आयोग ने इस बार परीक्षा में नरम रुख अपनाया। वर्ना पिछली बार की तरह 58 फीसद फेल होते तो परेशानी आयोग की ही बढ़नी थी।
















