कैसे पड़ा भारत का नाम इंडिया..क्या है इसके पीछे की कहानी

देश में इस सबसे बड़ी चर्चा देश के नाम को लेकर है..जी.20 देशों के सम्मेलन में प्रेसीडेंट द्रौपदी मुर्मू का पदनाम प्रेसीडेंट ऑफ भारत लिखे जाने से इसे और बल मिला..कहा जा रहा है कि भारत सरकार आगामी 18 से 22 सितंबर तक बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में देश का नाम बदलकर इंडिया से भारत कर सकती है..तो आइए जानते हैं हिंदुस्तान व भारत से इंडिया बनने की क्या है कहानी…

‘इंडिया’ शब्द का एक समृद्ध और आकर्षक इतिहास है, जिसका पता प्राचीन काल से लगाया जा सकता है। इसकी उत्पत्ति ‘सिंधु’ शब्द से हुई है, जो मूल रूप से सिंधु नदी के नाम से लिया गया है।
ईस्ट इंडिया कंपनी और इंडियन नेशनल कांग्रेस का गठन अंग्रेजों द्वारा किया गया है। भारतवर्ष के नाम की कहानी तो सीधे ऋषभदेव के पुत्र भरत से जुड़ती है। हिन्दू ग्रन्थ, स्कन्द पुराण (अध्याय-37 के अनुसार) “ऋषभदेव नाभिराज के पुत्र थे, ऋषभ के पुत्र भरत थे।

इधर कई और पुराण भी कहते हैं कि नाभिराज के पुत्र भगवान ऋषभदेव रहे और उनके बेटे रहे भरत, वे चक्रवर्ती थे और उनका साम्राज्य चहूं दिशाओं में फैला था और उनके नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यह वह कालखंड था जब भारत को भारतवर्ष, जम्बूद्वीप, भारतखण्ड, आर्यावर्त, हिन्दुस्तान, हिन्द, अल-हिन्द, ग्यागर, फग्युल, तियानझू, होडू जैसे कई दूसरे नामों से भी पुकारा जाता रहा।

इतिहासकारों के अनुसार मध्यकाल में जब भारत पर तुर्क और ईरानी आए तो उन्होंने सिंधुघाटी में प्रवेश किया। वे “स” का उच्चारण “ह” किया करते थे और इस तरह सिंधु को उन्होंने हिंदू के रूप में पुकारा और आगे इस राष्ट्र का नाम हिंदुस्तान हो गया। यहां तर्क यही था कि भारत में रहने वाले रहवासियों को उन्होंने हिंदू कहा और इस स्थान को हिंदुस्थान कहा।

इधर विवादित रहे और दक्षिणपंथ की राजनीति के स्तंभ रहे वीर सावरकार ने अपनी पुस्तक “हिंदुत्व” में भी इसका जिक्र किया है जिसे वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने अपनी पुस्तक हिंदू होने का धर्म में भी उल्लेख किया है। जहां वे सावरकर के हिंदुत्व को परिभाषित करते हैं।

भारत के इंडिया नामकरण के पीछे एक और कहानी है, जो इतिहास के गलियारों से यहां तक आती है। एक तरह से भारत के इंडिया हो जाने का सारा गणित यहीं से शुरू होता है और इसके पीछे सिंधु नदी अपना काम करती है। सिंधु नदी का दूसरा नाम इंडस भी था जबकि सिंधु सभ्यता के चलते भारत की सिंधु घाटी की सभ्यता को एक और पुरानी सभ्यता युनान जो आज का ग्रीक है वे लोग इंडो या इंडस घाटी की सभ्यता कहा करते थे, ऐसे में इंडस शब्द लैटिन भाषा में पहुंचा तो यह इंडिया हो गया। बता दें कि लैटिन बड़ी पुरानी भाषा रही जो रोमन साम्राज्य की आधिकारिक भाषा थी।

भारत को भारत, इंडिया और हिन्दुस्थान के नाम से विश्व के राष्ट्र जानते हैं पर हमारी सीमा के नजदीक वाले देशों ने हमारा पुराना नाम यानी हिन्दुस्थान (हिंदुओ का स्थान) अपने दैनिक प्रयोग में जारी रखा। पारसी, यहूदी, ग्रीक इन राष्ट्रों ने भी हमे सदैव से सिंधु यानी हिन्दू के तौर पर ही पुकारा।

इधर, अंग्रेजों के आगमन के साथ ही उस समय हिंदुस्तान के रूप में चर्चित हमारा देश इंडस वैली यानी की सिंधु घाटी की सभ्यता के रूप में भी पहचाना जाता रहा। ऐसे में अंग्रेजों ने इसे इंडस वैली के लिए लैटिन में प्रयोग होने वाले इंडिया को ही हमारे देश का नाम दे दिया और ऐसे ही हमारे देश का नाम पड़ा इंडिया।

आइए अब बात जरा संविधान के दायरे और आईने में करें तो संविधान बनने की प्रक्रिया जहां लंबी थी, वहीं यह कई तरह के मतभेदों के बीच चलती रही। जाहिर था जब राष्ट्र के नाम की बात आई हो वह भी कोई कम सरल कार्य नहीं था। संविधान सभा में भारत के नामकरण को लेकर बहस का लंबा दौर चला। कुछ सदस्य भारत को ‘भारत’ नाम रखने के प्रस्ताव पर अड़े थे तो वहीं कुछ कुछ सदस्य ‘भारतवर्ष’ नाम रखने के लिए प्रस्ताव रख रहे थे जबकि कुछ सदस्य ‘हिन्दुस्तान’ नाम रखने पर विचार कर रहे थे।

बहस में एक से एक धुरंधर थे। सेठ गोविंद दास, कमलापति त्रिपाठी, श्रीराम सहाय, हरगोविंद पंत और हरि विष्णु कामथ जैसे नेता भिड़े हुए थे। हरि विष्णु कामथ ने सुझाव दिया था कि भारत को भारत या फिर इंडिया के रूप में बदल दिया जाए।

लेकिन आखिर में इस प्रस्ताव के पक्ष में बहस करते हुए, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था-
‘इंडिया’ नाम एक अंतरराष्ट्रीय नाम है, जिसे दुनियाभर में जाना जाता है और यह नाम भारत के विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों को भी दर्शाता है। लिहाजा इंडिया भारत का वह नाम हो गया जो विश्व में जाना गया।

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