Ichhawar Constituency : इछावर जिसने छीनी तीन मुख्यमंत्रियों की कुर्सी

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रवि अवस्थी,भोपाल। Ichhawar Constituency ,district  Sehore राजनीति में धर्म,जाति का घालमेल  आम बात है..लेकिन इसमें अंधविश्वास व मिथक भी खूब चलते हैं…ऐसा ही एक मिथक है सीहोर जिले के इछावर कस्बे को लेकर..कहा जाता है..इछावर में जो मुख्यमंत्री पहुंचा..उसे अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी…जिन्होंने इसे गलत साबित करने का जतन किया,उन्हें इस मिथक के सच का सामना करना पड़ा..

इसलिए बना ये मिथक
..मौजूदा सीएम शिवराज अपने 16 साल के कार्यकाल में एक बार भी इछावर नहीं गए,जबकि उनका यह गृह जिला (सीहोर)है।

.. वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी इस मिथक को तोड़ने का प्रयास किया। 15 नवंबर, 2003 को इछावर में आयोजित एक सहकारी सम्मेलन में वह शामिल हुए। इसी साल प्रदेश में कांग्रेस बुरी तरह हारी और दिग्विजय दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन सके। यहां तक कि मप्र कांग्रेस को भी लम्बा वनवास भोगना पड़ा।

इससे पहले 12 जनवरी 1962 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.कैलाशनाथ काटजू इछावर पहुंचे।

करीब दो माह बाद ही हुए चुनाव में कांग्रेस हार गई और डॉ. काटजू को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

इसी तरह,1 मार्च 1967 को तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र भी इछावर पहुंचे थे।

एक सप्ताह बाद ही यानी 7 मार्च 1967 को हुए नए मंत्रिमंडल के गठन से उपजे असंतोष के चलते मिश्र को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

है बीजेपी के प्रभाव वाली सीट

अब इसे मिथक कहें या कुछ और,इछावर व मुख्यमंत्रियों को लेकर उक्त घटनाक्रम कड़वा सच है..हालांकि इछावर विधानसभा क्षेत्र की अन्य बसाहट को लेकर ऐसा कोई मिथक नहीं है। वर्ष 1977 में गठित इस सीट पर अब तक 10 बार चुनाव हुए। जिनमें 8 चुनाव बीजेपी ने जीते। बीजेपी के करण सिंह वर्मा (Photo)यहां से छह बार के विधायक हैं। इससे समझा जा सकता है कि यह क्षेत्र बीजेपी के प्रभाव वाला है। 16 वर्षों से अधिक समय के मुख्यमंत्री शिवराज ने इस धारणा को और मजबूत किया है। आइए जानते हैं ​कैसा रहा इस सीट का सियासी सफर..

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1977 में हुए परिसीमन बाद बनी इछावर सीट
अब तक हुए 10 चुनाव में 8 बार जीती भाजपा
2013 में प्रत्याशी बदलना बीजेपी को पड़ा महंगा
40 साल में दो बार जीत हासिल कर सकी कांग्रेस
भोपाल के नजदीक,पर विदिशा लोस का हिस्सा
इछावर नगर को लेकर वर्षों से जारी है मिथक
जो मुख्यमंत्री इछावर पहुंचे, वे कुर्सी गंवा बैठे
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बाहरी प्रत्याशी वोटर्स को कभी रास नहीं आए

प्रदेश के विकास में खाती व मेवाड़ा समाज का बहुमूल्य योगदान रहा है..और ये दोनों ही समाज की सर्वाधिक सीहोर जिले की इछावर विधानसभा में निवास करती है…

विधानसभा क्षेत्र में करीब 60 से 70 प्रतिशत संख्या इसी वर्ग के मतदाताओं

 की है..इनके जिनका साथ मिला ताज उसके सिर सजा..इस सीट से छह बार के विधायक एवं पूर्व मंत्री करण सिंह वर्मा खाती समाज से आते हैं..यही वजह है कि उनके अपने समाज का सहयोग उन्हें हमेशा मिलता रहा..

अब तक हुए चुनाव में जब-जब बाहरी प्रत्याशी को उतारने की कोशिश जिस दल ने भी उसे यहां पराजय का सामना करना पड़ा..वर्ष 1993 में कांग्रेस ने भोपाल के अजीज कुरैशी को इस सीट से अपना उम्मीदवार बनाया..तब भाजपा के करण सिंह वर्मा ने उन्हें 13 हजार से अधिक मतों से शिकस्त दी..कुरैशी को सिर्फ 34 प्रतिशत वोट मिल सके..
ऐसा ही एक और प्रयास कांग्रेस ने 1990 में भी किया जब ईश्वर सिंह चौहान को उसने अपना उम्मीदवार बनाया.. तब भी उसे निराशा हाथ लगी..2008 में भी डाॅ बलवीर तोमर को प्रत्याशी बनाए जाने पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा …ऐसा ही एक प्रयास वर्ष 1980 में भाजपा ने किया…
उसने भी भोपाल के नारायण प्रसाद गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया और गुप्ता यह चुनाव करीब साढ़े 16 हजार मतों से हारे.. मतलब साफ है कि कोई भी बाहरी प्रत्याशी , क्षेत्र के बहुसंख्यक खाती व मेवाड़ा समाज की पसंद नहीं रहा…
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क्षेत्र के कुल मतदाता              2,20,026
पुरुष मतदाता                      1,14,703
महिला मतदाता                   1,05,323
खाती व मेवाड़ा                   70 प्रतिशत
अजा                                 10 प्रतिशत
अजजा                              10 प्रतिशत
मुस्लिम                             06 प्रतिशत
अन्य                                 04 प्रतिशत
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इछावर में रहा हमेशा कड़ा मुकाबला
इछावर में अब तक हुए 10 में से 8 चुनाव भले भाजपा ने जीते,लेकिन उसका मुकाबला आसान नहीं रहा..

बीते दो दशक में हुए चार चुनावों की ही बात करें तो इनमें तीन बार भाजपा के करण सिंह वर्मा तो 2013 में कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल ने वर्मा को मात दी…

वर्ष 2003 के चुनाव में ही वर्मा ने कांग्रेस के हेमराज परमार को करारी शिकस्त दी.. इस चुनाव में वर्मा को 41 तो परमार को सिर्फ 26 प्रतिशत वोट मिले..

इसके बाद वर्ष 2008 व 2018 के चुनाव में विजयी रहे वर्मा के मत प्रतिशत में उतार .चढाव बना रहा..वर्ष 2008 के चुनाव में वर्मा ने 44 प्रतिशत तो कांग्रेस के डाॅ बलवीर सिंह तोमर ने 28 प्रतिशत मत हासिल किए…

वहीं 2018 के चुनाव में वर्मा को 50 तो कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल को 41 प्रतिशत मत मिले… इसी तरह,2013 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल से 744 मतों से हार का सामना करना पडा..इस चुनाव में शैलेंद्र व वर्मा के बीच मतों का प्रतिशत लगभग बराबर रहा था…
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इछावर विधानसभा में अब तक विजयी प्रत्याशी व उनका दल
1977 : नारायण प्रसाद गुप्ता,        जनता पार्टी
1980 : हरि चरण वर्मा               कांग्रेस
1985 : करण सिंह वर्मा             बीजेपी
1990 : करण सिंह वर्मा             बीजेपी
1993 : करण सिंह वर्मा             बीजेपी
1998: करण सिंह वर्मा              बीजेपी
2003 : करण सिंह वर्मा             बीजेपी
2008:  करण सिंह वर्मा            बीजेपी
2013 : शैलेंद्र पटेल                 कांग्रेस
2018 : करण सिंह वर्मा            बीजेपी
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मुद्दा नहीं, चेहरा अधिक प्रभावी

वर्ष 2013 का चुनाव वर्मा प्रदेश सरकार में मंत्री रहते हारे..अगले चुनाव में वापस इस सीट से विधायक बने..लेकिन तक उनकी पार्टी सत्ता में नहीं लौटी…डेढ़ साल बाद जैसे-तैसे पार्टी की सरकार बनी भी तो वर्मा को मंत्री बनने का अवसर नहीं मिला.. इसके चलते इछावर क्षेत्र में विकास कार्यों को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी..

इछावर में यूं तो कोई बड़ा मुद्दा नहीं लेकिन पेयजल की कमी,कोई बड़ा उद्योग यहां की सरजमीं पर नहीं उतरना,उच्चस्तरीय महाविद्यालय की कमी व बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं आज भी मतदाताओं को सालती है…

हालांकि इछावर को नई अस्पताल की सौगात मिली,लेकिन डॉक्टर्स की कमी अब भी मतदाताओं को सालती है। वर्षांत में होने वाले चुनाव में ये मुद्दे जोर पकड़ सकते हैं…

आगामी चुनाव में भी दोनों ही प्रमुख दलों की ओर से प्रत्याशी दोहराए जाने के आसार हैं..ऐसे में किसके सिर सजेगा इछावर सीट का ताज इसके लिए चुनाव परिणाम आने तक करना होगा इंतजार….