Ichhawar Assembly:इछावर जहां 10 दफा के चुनाव में 8 बार खिला ‘कमल ‘

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“हर राज्य में कुछ जगह ऐसी है..जिनके बारे में कहा जाता है कि वहां जो मुख्यमंत्री गया ,उसकी कुर्सी खतरे में पड़ी..मप्र में भी यही मिथक सीहोर जिले के इछावर को लेकर भी कायम है..इस मिथक को जिसने गलत साबित करने का जतन किया..उसे कुर्सी गंवानी पड़ी..”

रवि अवस्थी ,भोपाल। Ichhawar Assembly सियासत में अंधविश्वास भी खूब चलता है..हर राज्य में कुछ जगह ऐसी है..जिनके बारे में कहा जाता है कि वहां जो मुख्यमंत्री गया ,उसकी कुर्सी खतरे में पड़ी..मप्र में भी यही मिथक सीहोर जिले के इछावर को लेकर भी कायम है..इस मिथक को जिसने गलत साबित करने का जतन किया..उसे कुर्सी गंवानी पड़ी..इसके चलते राजनेताओं का यह भरोसा और मजबूत होता चला गया..

बहरहाल,इछावर और सीएम की कुर्सी के पीछे की वजह जो भी हो..लेकिन 1977 में गठित इस विधानसभा क्षेत्र को लेकर एक कड़वा सच यही है कि यहां के सहज,सरल नेता एवं बीजेपी से 6 बार के विधायक करण सिंह वर्मा सब पर भारी हैं..एक बार बीजेपी ने उनका टिकट काटा तो उसे हार का सामना करना पडा… इछावर विधानसभा में आगे किनके बीच होगा संग्राम,यह जानने से पहले समझते हैं इस सीट का अब तक कैसा रहा सियासी मिजाज…
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1977 में हुए परिसीमन बाद बनी इछावर सीट
अब तक हुए 10 चुनाव में 8 बार जीती भाजपा
2013 में प्रत्याशी बदलना बीजेपी को पडा महंगा
40 साल में दो बार जीत हासिल कर सकी कांग्रेस
भोपाल के नजदीक,पर विदिशा लोस का हिस्सा
इछावर नगर को लेकर वर्षों से जारी है मिथक
जो मुख्यमंत्री इछावर पहुंचे, वे कुर्सी गंवा बैठे
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इछावर में 70 प्रतिशत खाती ,मेवाड़ा समाज

प्रदेश के विकास में खाती व मेवाड़ा समाज का बहुमूल्य योगदान रहा है..और ये दोनों ही समाज की सर्वाधिक सीहोर जिले की इछावर विधानसभा में निवास करती है… विधानसभा क्षेत्र में करीब 60 से 70 प्रतिशत संख्या इसी वर्ग के मतदाताओं की है..इनके जिनका साथ मिला ताज उसके सिर सजा..इस सीट से छह बार के विधायक एवं पूर्व मंत्री करण सिंह वर्मा खाती समाज से आते हैं..
यही वजह है कि उनके अपने समाज का सहयोग उन्हें हमेशा मिलता रहा..

अब तक हुए चुनाव में जब.जब बाहरी प्रत्याशी को उतारने की कोशिश जिस दल ने भी उसे यहां पराजय का सामना करना पडा..वर्ष 1993 में कांग्रेस ने भोपाल के अजीज कुरैशी को इस सीट से अपना उम्मीदवार बनाया..तब भाजपा के करण सिंह वर्मा ने उन्हें 13 हजार से अधिक मतों से शिकस्त दी..कुरैशी को सिर्फ 34 प्रतिशत वोट मिल सके..

ऐसा ही एक और प्रयास कांग्रेस ने 1990 में भी किया जब ईश्वर सिंह चौहान को उसने अपना उम्मीदवार बनाया.. तब भी उसे निराशा हाथ लगी..2008 में भी डाॅ बलवीर तोमर को प्रत्याशी बनाए जाने पर कांग्रेस को हार का सामना करना पडा…ऐसा ही एक प्रयास वर्ष 1980 में भाजपा ने किया…

उसने भी भोपाल के नारायण प्रसाद गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया और गुप्ता यह चुनाव करीब साढ़े 16 हजार मतों से हारे.. मतलब साफ है कि कोई भी बाहरी प्रत्याशी , क्षेत्र के बहुसंख्यक खाती व मेवाड़ा समाज की पसंद नहीं रहा…
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क्षेत्र के कुल मतदाता               2.20,026
पुरुष मतदाता                       1,14,703
महिला मतदाता                     1,05,323
खाती व मेवाड़ा                      70 प्रतिशत
अजा                                    10 प्रतिशत
अजजा                                 10 प्रतिशत
मुस्लिम                                 06 प्रतिशत
अन्य                                     04 प्रतिशत
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इछावर में रहा हमेशा कड़ा मुकाबला
इछावर में अब तक हुए 10 में से 8 चुनाव भले भाजपा ने जीते,लेकिन उसका मुकाबला आसान नहीं रहा.. बीते दो दशक में हुए चार चुनावों की ही बात करें तो इनमें तीन बार भाजपा के करण सिंह वर्मा तो 2013 में कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल ने वर्मा को मात दी…वर्ष 2003 के चुनाव में ही वर्मा ने कांग्रेस के हेमराज परमार को करारी शिकस्त दी.. इस चुनाव में वर्मा को 41 तो परमार को सिर्फ 26 प्रतिशत वोट मिले..

इसके बाद वर्ष 2008 व 2018 के चुनाव में विजयी रहे वर्मा के मत प्रतिशत में उतार .चढाव बना रहा..वर्ष 2008 के चुनाव में वर्मा ने 44 प्रतिशत तो कांग्रेस के डाॅ बलवीर सिंह तोमर ने 28 प्रतिशत मत हासिल किए…

वहीं 2018 के चुनाव में वर्मा को 50 तो कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल को 41 प्रतिशत मत मिले… इसी तरह,2013 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल से 744 मतों से हार का सामना करना पडा..इस चुनाव में शैलेंद्र व वर्मा के बीच मतों का प्रतिशत लगभग बराबर रहा था…
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इछावर विधानसभा में अब तक विजयी प्रत्याशी व उनका दल
1977 : नारायण प्रसाद गुप्ता,                          जनता पार्टी
1980 : हरि चरण वर्मा                                     कांग्रेस
1985 : करण सिंह वर्मा                                   बीजेपी
1990 : करण सिंह वर्मा                                   बीजेपी
1993 : करण सिंह वर्मा                                  बीजेपी
1998: करण सिंह वर्मा                                   बीजेपी
2003 : करण सिंह वर्मा                                 बीजेपी
2008: करण सिंह वर्मा                                  बीजेपी
2013 : शैलेंद्र पटेल                                      कांग्रेस
2018 : करण सिंह वर्मा                                बीजेपी
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मुद्दा नहीं, चेहरा अधिक प्रभावी

वर्ष 2013 का चुनाव वर्मा प्रदेश सरकार में मंत्री रहते हारे..अगले चुनाव में वापस इस सीट से विधायक बने..लेकिन तक उनकी पार्टी सत्ता में नहीं लौटी…डेढ़ साल बाद जैसे-तैसे पार्टी की सरकार बनी भी तो वर्मा को मंत्री बनने का अवसर नहीं मिला.. इसके चलते इछावर क्षेत्र में विकास कार्यों को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी..

इछावर में यूं तो कोई बड़ा मुद्दा नहीं लेकिन पेयजल की कमी,कोई बड़ा उद्योग यहां की सरजमीं पर नहीं उतरना,उच्चस्तरीय महाविद्यालय की कमी व बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं आज भी मतदाताओं को सालती है…वर्षांत में होने वाले चुनाव में ये मुद्दे जोर पकड़ सकते हैं…

आगामी चुनाव में भी दोनों ही प्रमुख दलों की ओर से प्रत्याशी दोहराए जाने के आसार हैं..ऐसे में किसके सिर सजेगा इछावर सीट का ताज इसके लिए चुनाव परिणाम आने तक करना होगा इंतजार….

जानें कैसे सही साबित हुए इछावर का मिथक

1 . कहते हैं जो मुख्यमंत्री इछावर गया ,उसकी कुर्सी चली गई। इसके चलते ,मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने 16 वर्ष के कार्यकाल में एक दिन भी इस कस्बे में नहीं पहुंचे। जबकि उनका यह गृह जिला (सीहोर)है।

2 – वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी इस मिथक को तोड़ने का प्रयास किया। 15 नवंबर, 2003 को आयोजित सहकारी सम्मेलन में शामिल होने वह इछावर पहुंचे थे। यही नहीं, मंच से उन्होंने इस मिथक और इसे तोड़ने का जिक्र भी किया। इसके बाद मध्य प्रदेश में हुए चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसमें दिग्विजय ही नहीं ,मप्र कांग्रेस को भी लम्बा वनवास भोगना पड़ा।

3 . इछावर के मिथक को तोड़ने की कोशिश मुख्यमंत्री डॉ. कैलाश नाथ काटजू ने भी की थी। काटजू 12 जनवरी 1962 को विधानसभा चुनाव के एक कार्यक्रम में भाग लेने इछावर गए थे। करीब दो माह बाद ही 11 मार्च 1962 को हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई और डॉ. कैलाश नाथ काटजू को अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

4 . वहीं 1 मार्च 1967 को द्वारका प्रसाद मिश्र भी इछावर पहुंचे थे। एक सप्ताह बाद ही यानी 7 मार्च 1967 को हुए नए मंत्रिमंडल के गठन से उपजे असंतोष के चलते मिश्र को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।