भोपाल।
पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी (MPPKVVCL)में चीफ इंजीनियर (सीई) की संविदा नियुक्ति को लेकर उठे विवाद ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। आरोप है कि एक खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए नियम-कायदों को दरकिनार कर पूरी प्रक्रिया तैयार की गई।
पहले नीति बनाई, फिर उम्मीदवार तय?
सूत्रों के मुताबिक, कंपनी ने पहले से तय नियुक्ति को अमलीजामा पहनाने के लिए जल्दबाजी में नई संविदा नीति बनाई।
8 अप्रैल को बोर्ड बैठक में रिटायर्ड अधिकारियों को संविदा पर सीई बनाने का रास्ता खोला गया और कुछ ही दिनों में प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई।
सिर्फ एक आवेदन, फिर भी मंजूरी की तैयारी
हैरानी की बात यह रही कि इस अहम पद के लिए सिर्फ बाबूलाल चौहान का एक ही आवेदन बुलाया गया।
जांच समिति ने आवेदन में कमियां भी बताईं, लेकिन इसके बावजूद फाइल को मंजूरी के लिए ऊर्जा विभाग भेज दिया गया।
21 वरिष्ठ इंजीनियर पहुंचे हाईकोर्ट
कंपनी के 21 वरिष्ठ इंजीनियरों ने इस प्रक्रिया को नियमविरुद्ध बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
उनका कहना है कि इससे न केवल नियमों का उल्लंघन हुआ, बल्कि मौजूदा इंजीनियरों के प्रमोशन के अवसर भी प्रभावित हो रहे हैं।
कोर्ट की सख्ती, प्रक्रिया पर रोक
मामले की पहली ही सुनवाई में कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया संदिग्ध मानते हुए तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। साथ ही शासन, बिजली कंपनी और संबंधित आवेदक समेत पांच पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
RTI से खुली परतें
याचिकाकर्ताओं ने आरटीआई के जरिए दस्तावेज जुटाकर कोर्ट में पेश किए। इसमें सामने आया कि प्रदेश की अन्य बिजली कंपनियों में ऐसी संविदा नीति लागू ही नहीं है। जिस पद पर नियुक्ति की जा रही है, वह संविदा श्रेणी में स्वीकृत भी नहीं है।
‘मनमानी नियुक्ति’ का आरोप
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि पूरी प्रक्रिया एक व्यक्ति विशेष को लाभ देने के उद्देश्य से की गई। अगर ऐसा होता है तो वर्षों से सेवा दे रहे इंजीनियरों के करियर पर सीधा असर पड़ेगा।
यह मामला अब सिर्फ एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि सिस्टम में पारदर्शिता और नियमों के पालन का बड़ा सवाल बन गया है।