भोपाल।
मध्यप्रदेश के एक निजी विश्वविद्यालय से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों ने उच्च शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इनमें विक्रम विवि के एक प्रोफेसर की दो राज्यों के एक ही निजी संस्थान में कुलगुरु पद पर नियुक्ति,छात्र की संदिग्ध अंकसूची और विधानसभा में गलत जानकारी देने जैसे आरोप शामिल हैं। तीनों मामलों की कड़ी एक ही निजी संस्थान से जुड़ने के कारण मामला और भी गंभीर हो गया है।
प्रोफेसर की नियुक्ति पर उठे सवाल
विक्रम विश्वविद्यालय के एक विभागाध्यक्ष प्रोफेसर की सेवाएं लगभग दो वर्ष पूर्व संबंधित निजी विश्वविद्यालय को प्रदान की गई थीं। इसके बाद निजी संस्थान ने उन्हें न केवल मध्यप्रदेश, बल्कि छत्तीसगढ़ स्थित अपने संस्थान में भी कुलगुरु के पद पर नियुक्त कर दिया।
इधर, इसी वर्ष 31 जनवरी को उक्त प्रोफेसर का कार्यकाल पूर्ण होने पर विक्रम विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें विधिवत सेवानिवृत्ति प्रदान की और विदाई समारोह भी आयोजित किया।
उज्जैन विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार का दावा है कि संबंधित प्राध्यापक को “कंपिटेंट अथॉरिटी” की अनुमति से निजी संस्थान में सेवाएं देने की छूट दी गई थी, लेकिन उस अथॉरिटी का नाम स्पष्ट नहीं किया गया।
इधर, सागर निवासी समाजसेवी सुधाकर सिंह राजपूत ने राज्यपाल सहित अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को शिकायत भेजकर पूछा है कि जब प्रदेश में हजारों शैक्षणिक पद रिक्त हैं, तब एक प्रोफेसर की सेवाएं निजी संस्थान को किस आधार पर सौंपी गईं। शिकायत में यह भी आरोप है कि नियुक्ति के लिए न तो कोई विज्ञापन जारी किया गया और न ही वैधानिक प्रक्रिया अपनाई गई।
निजी के साथ विक्रम विवि से भी लाभ लेने का संदेह
शिकायतकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि संबंधित प्राध्यापक की विक्रम विवि से विधिवत सेवानिवृत्ति और विदाई गत 31 जनवरी 2026 को हुई। उन्होंने आशंका जताई कि प्राध्यापक निजी संस्थान के साथ विक्रम विश्वविद्यालय से सुविधाएं लेते रहे। जो लोकसेवा आचरण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।
छात्र ने अपनी ही डिग्री पर उठाए सवाल
इसी निजी विश्वविद्यालय से जुड़े एक अन्य मामले में बालाघाट निवासी छात्र आशीष धुर्वे ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत देकर अपनी अंकसूची की वैधता पर ही संदेह जताया है। छात्र के अनुसार, वर्ष 2022 में बीएसडब्ल्यू कोर्स की परीक्षा के बाद जारी अंकसूची में परीक्षा केंद्र का नाम तक दर्ज नहीं है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नियमों के उल्लंघन के चलते विश्वविद्यालय को करीब छह माह पहले यूजीसी द्वारा डिफाल्टर घोषित किया गया था, इसके बावजूद वहां शैक्षणिक गतिविधियां जारी हैं, जिससे छात्रों के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है।
विधानसभा में गलत जानकारी देने का आरोप

मामला यहीं नहीं थमा। परसवाड़ा विधायक मधु भगत ने भी इसी विश्वविद्यालय को लेकर उच्च शिक्षा विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
विधायक ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा कि विधानसभा के बजट सत्र 2026 में पूछे गए उनके प्रश्न (क्रमांक 2192) के जवाब में विभाग ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ऐसी कोई शिकायत या फाइल लंबित नहीं है, जबकि विभाग में संबंधित अनियमितताओं की जानकारी पहले से मौजूद थी।
उन्होंने इसे तथ्य छिपाने और निजी संस्थान को संरक्षण देने की कोशिश बताते हुए उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
जांच की मांग तेज, कई स्तरों पर घिरा संस्थान
तीनों मामलों के सामने आने के बाद यह निजी विश्वविद्यालय अब प्रशासनिक, शैक्षणिक और राजनीतिक—तीनों स्तरों पर सवालों के घेरे में आ गया है। शिकायतकर्ताओं ने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
















