रायपुर।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में रुचि रखने वालों को यह खबर चौंका सकती है। छग हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने हत्या के एक मामले में कांग्रेस नेता अमित जोगी को दोषी करार दिया है। यही नहीं,उन्हें सरेंडर करने की नसीहत भी दी है।
करीब दो दशक तक कानूनी उलझनों में फंसा NCP नेता रामावतार जग्गी हत्याकांड आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को दोषी ठहराया है। न्यायालय ने कहा- पुराने फैसले हमेशा अंतिम नहीं होते,अगर न्याय अधूरा हो।
सरेंडर करने का आदेश
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 2007 में आए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया। जिसमें अमित जोगी को बरी कर दिया गया था।
कोर्ट ने अब उन्हें तीन हफ्तों के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है।
कैसे बदला केस का रुख?
यह मामला लंबे समय तक ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा था, क्योंकि 2011 में हाई कोर्ट ने CBI की अपील को देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने केस को नई जिंदगी दे दी।
पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मामले पर दोबारा विचार करे। इसी के बाद सुनवाई फिर शुरू हुई और अब यह बड़ा फैसला सामने आया।
2003 में हुई थी सनसनीखेज हत्या
4 जून 2003 को NCP नेता रामावतार जग्गी की हत्या उस समय हुई थी, जब अजीत जोगी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इस हत्याकांड ने उस दौर में राज्य की राजनीति को झकझोर दिया था।
शुरुआत में जांच राज्य पुलिस ने की, लेकिन बाद में केस CBI को सौंपा गया। एजेंसी ने अमित जोगी समेत कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी।
ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी
31 मई 2007 को रायपुर की ट्रायल कोर्ट ने कई आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित माने, लेकिन अमित जोगी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।
अब हाई कोर्ट के फैसले ने उस निर्णय को पलटते हुए एक बार फिर यह संदेश दिया है कि न्याय की प्रक्रिया लंबी जरूर हो सकती है, लेकिन अंतिम पड़ाव तक पहुंचती है।
क्या है बड़ा संकेत?
यह फैसला सिर्फ एक केस का निष्कर्ष नहीं, बल्कि न्यायिक प्रणाली की उस क्षमता का उदाहरण है, जिसमें वर्षों बाद भी सच्चाई सामने लाई जा सकती है—अगर उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट सक्रिय भूमिका निभाएं।