केंद्रीय मंत्री शिवराज की एक और कड़ी परीक्षा

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सत्ता के गलियारे से…. रवि अवस्थी(Bhopal)
** शिवराज की नई चुनौती
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी ने झारखंड का पार्टी चुनाव प्रभारी बनाया है।सहयोगी के तौर पर असम के सीएम हिमंत बिस्वा शर्मा भी हैं। शिवराज ने झारखंड में चुनावी बिसात बिछाना भी शुरू कर दिया है।प्रभारी के साथ ही स्टार प्रचारक की भूमिका में आकर केंद्रीय मंत्री ने झारखंड में वक्त से पहले चुनावी माहौल पैदा कर दिया।
अपने चित-परिचित अंदाज में ​शिवराज मतदाताओं को सोरेन सरकार की वादा खिलाफी गिना रहे हैं तो झारखंड स्थापना को लेकर पूर्व पीएम अटल जी के योगदान का उल्लेख करना भी वह नहीं भूलते।
केंद्रीय मंत्री के इस आक्रामक अंदाज ने झामुमो व उसके सहयोगी दलों की चिंता बढ़ा दी है। जो जेल गए सीएम हेमंत सोरेन की वापसी से सियासी समीकरण बदलने की उम्मीद लगाए हुए हैं। झारखंड की सत्ता में बीजेपी की वापसी हुई तो यह एक और मोर्चे पर शिवराज की बढ़ी सफलता होगी।
** विकास को दी गति
चुनाव का दौर खत्म होते ही मप्र एक बार फिर विकास पथ पर तेज गति से आगे बढ़ रहा है। इसका श्रेय जाता है प्रदेश के मुखिया डॉ.मोहन यादव को। जिन्होंने चुनावी व्यस्तता से फारिग होते ही अपने विजन को मूर्तरूप देना शुरू किया। रीजनल इं​डस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट कॉनक्लेव श्रृंखला इसकी बानगी है।सामाजिक न्याय क्षेत्र की योजनाओं को गति ​देने की बात हो या सुशासन लाने की कवायद। प्रदेश के कल्याण को लेकर किए जा रहे उनके चौतरफा प्रयासों ने लोगों को अपनी धारणा बदलने पर मजबूर कर दिया है।
** महंगा पड़ा प्रभार
मप्र विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ.गोविंद सिंह को कांग्रेस ने विजयपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाया,लेकिन उनके विरोधियों का यह रास नहीं आया। डॉ.सिंह नए क्षेत्र में सक्रिय होते,उससे पहले ही लहार की उनकी कोठी की नपाई शुरू हो गई।व जह बताई गई कि इलाके का एक आम रास्ता उनकी कोठी के बीच से होकर गुजरता है।कार्यवाही रुकवाने कांग्रेस नेता के परिजन हाईकोर्ट भी पहुंचे लेकिन राहत नहीं मिली। गेंद अब प्रतिद्वंदी दल के पाले में है।संदेश साफ है,कोठी बचा लो या सीट।आठ बार विधायक रहे पूर्व मंत्री डॉ.सिंह यूं भी समन्वय की राजनीति में अधिक भरोसा रखते हैं।शायद यही वजह है कि अब तक उन्होंने सिर्फ स्थानीय विधायक अंबरीष शर्मा को ही निशाने पर रखा।
** नहीं खोले पत्ते
लोकसभा चुनाव के दौरान बीना विधायक निर्मला सप्रे ने भी बीजेपी का दामन थामा,लेकिन अब तक विधायकी नहीं छोड़ी। सप्रे को सही वक्त का इंतजार है। वह कब आएगा? इसे लेकर संशय कायम है। अलबत्ता,यह तय है कि विधानसभा सचिवालय में कांग्रेस की चिट्ठी पहुंचने के बाद सप्रे के समक्ष इधर कुंआ,उधर खाई वाली स्थिति बन चुकी है।
** निशाने पर सारंग
सूबे की सियासत में संभवतया यह दो विरले उदाहरण हैं-पहला जब किसी पूर्व मंत्री के कार्यकाल की गड़बड़ी पर मौजूदा मंत्री से इस्तीफा मांगा जाए। दूसरा,इसी मुृद्दे पर सदन में ध्यानाकर्षण पर साढ़े छह घंटे की चर्चा हो। इस फिर भी बात न बने तो पहले सदन और अब सड़कों पर हंगामा।यानी मुद्दे को हर हाल में जीवित रखा जाए। बीते एक पखवाड़े से जारी शह-मात की इस सियासत के केंद्र में हैं,सिर्फ सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग। अब तक के घटनाक्रमों से एक बात तो साफ है कि मामला एकतरफा नहीं है। यानी न्यायालय में विचाराधीन नर्सिंग घोटाले की आड़ में विपक्ष यदि अपनी धार तेज कर रहा है तो पर्दे के पीछे उसे शह देने वाले भी पूरी ताकत से जुटे हुए हैं।
** खुरई भी सुर्खियों में
खुरई के बड़ोदिया नोनगिर गांव के एक दलित परिवार के तीन लोगों की मौत का मामला भी सुर्खियों में है।वारदात भले ही सालभर पुरानी है,लेकिन सियासी पुट इसे लगातार चर्चा में बनाए हुए है। सांसद दिग्विजय सिंह ने इस मामले में पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग उठाई है। संभव है,भोपाल के बाद सियासत का अगला रुख अब बुंदेलखंड की ओर रहे। हालांकि,नर्सिंग मामले के हश्र को देखते हुए मप्र में सीबीआई की सीमा पहले ही तय कर दी गई है।
** जांच पर जांच
मप्र ग्रामीण आजीविका मिशन अपनी स्थापना के समय से ही अपनी अनोखी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहा है।नया मामला यहां 9 साल पहले हुए संविदा नियुक्तियों की चौथी बार दी गई जांच के आदेश का है। नियुक्ति करने व करवाने वाले दोनों रिटायर हो गए। निजाम भी बदल चुका,लेकिन जांच है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। प्रकरण की पहली जांच 2022 में हुई मप्र रोजगार गारंटी परिषद की तत्कालीन सीईओ नेहा मराव्या ने की थी।
इसके बाद ग्रामीण विकास विभाग के तत्कालीन पीएस उमाकांत उमराव व इनके बाद मौजूदा एसीएस मलय श्रीवास्तव ने।जांच रिपोर्ट में आइना दिखाना 2011 बैच की मराव्या को महंगा पड़ा। बेवजह,कई बार अपमान के कड़वे घूंट पिए।
मौजूदा जांच अधिकारी मनोज पुष्प भी इसी बैच के अधिकारी हैं। पुष्प को हवा का रुख भांप कर काम करने वालों में हैं। यूं भी उनका मानना है,जीवन में जीत से बड़ा सबक हार सिखाती है। उनकी जांच रिपोर्ट के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि इसकी पांचवी बार नौबत नहीं आएगी।
** यह तो हद हो गई
साल 2022 की पुणे की ट्रेनी आइएएस पूजा खेडकर का मामला सोशल मीडिया पर छाया तो ट्रोलर ने अन्य नए नवेले अफसरों के चयन पर भी सवाल खड़े करना शुरू कर दिए..इनमें एक हैं इसी बैच में मप्र कैडर की प्रोबेशनरी आईपीएस अनु बेनीवाल। अनु इसलिए ट्रोल हुईं क्योंकि उनके पिता और उन्हीं के गांव पीतमपुरा दिल्ली निवासी आइपीएस संजय बेनीवाल का नाम एक है।
फर्क इतना है कि अनु के पिता किसान हैं।वहीं वर्ष 1989 बैच के आईपीएस संजय बेनीवाल वर्तमान में तिहाड़ जेल के डायरेक्टर जनरल। अनु वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को अपना रोल मॉडल मानती है व गांव की परंपरा अनुसार,उन्हें ताऊ कहती हैं,लेकिन ट्रोलर्स ने आइपीएस को ही अनु का पिता बता उनकी आय व चयन पर सवाल उठा दिए। मामला तूल पकड़ने पर अनु को ही सफाई देने आगे आना पड़ा। अनु बेनीवाल फिलहाल हैदराबाद में 31 अगस्त तक ट्रेनिंग पर हैं।इसके बाद उनकी नई पदस्थापना होगी।
** अभी और इंतजार
आमतौर पर किसी आयोग का कार्यकाल उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही खत्म मान लिया जाता है..लेकिन कर्मचारी आयोग के मामले में ऐसा नहीं है.इस आयोग का कार्यकाल खत्म होने के बाद छह माह के लिए अचानक बढ़ गया..सेवानिवृत अधिकारी जीपी सिंघल की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन मप्र के कर्मचारियों की वेतन विसंगति दूर करने के इरादे से किया गया था। आयोग ने बीते दिनों अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी..रिपोर्ट के सुझावों पर अमल होता..इससे पहले ही आयोग का कार्यकाल दिसंबर तक फिर बढ़ा दिया गया..इसके चलते प्रदेश के साढ़े सात लाख कर्मचारियों को अपनी वेतन विसंगति दुरुस्त होने के लिए कम से कम छह माह तो और इंतजार करना पड़ेगा।
** जगी दिन बहुरने की उम्मीद
मप्र की डॉ मोहन यादव सरकार ने सरकारी महकमों में दो लाख पदों की भर्ती के रोडमैप पर काम शुरू कर दिया है..सरकार के इस फैसले से बेरोजगारों की उम्मीदें तो बढ़ीं..मंत्रालय में विधानसभा चुनाव के वक्त से खाली हाथ बैठे कई अफसरों को काम मिल गया है..इधर,औद्याेगिक निवेश को लेकर शुरू हुईं मासिक रीजनल इंडस्ट्रियल कॉनक्लेव के आयोजन से भी अफसरों को अपने दिन बहुरने की उम्मीद जगी है..काम तो कई अन्य मोर्चो पर भी खुला..लेकिन इन दो बड़े मामलों को लेकर मंत्रालय में अधिकारियों की व्यस्तता व कामकाज की गति बढ़ गई है..।