…ताकि मतदाता महसूस करे,उसका फैसला सही था

22
cm_dr._mohan_yadav

रवि अवस्थी,भोपाल

बीते माह,13 दिसंबर को सागर लोकायुक्त पुलिस ने वहां केरबना गांव के कोटवार जोगेंद्र चढ़ार को ढाई हजार रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा। यह वही दिन है,जब उज्जैन विधायक डॉ.मोहन यादव प्रदेश के नए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। मानदेय आधार पर काम करने वाला कोटवार सरकारी व्यवस्था में अंतिम पंक्ति का सबसे छोटा कर्मचारी है।उसका रिश्वत मामले में पकड़ा जाना,बताता है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। ऐसे दौर में रामराज्य की कल्पना तो नहीं की जा सकती,लेकिन’नमक में आटा’मिलने वाले हालात बनने लगे तो जायका बिगड़ना स्वाभाविक है।पिछले विधानसभा चुनाव से पहले निर्मित एंटी इनकम्बेंसी माहौल की एक बड़ी वजह,प्रशासनिक अराजकता भी रही। तत्कालीन सरकार जब तक इसे समझती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।अच्छी बात यह कि डॉ.मोहन यादव की सरकार ने इसे शुरुआत में ही समझ लिया।

डॉ.मोहन यादव सरकार का एक माह 

डॉ यादव सरकार का आज एक माह का कार्यकाल पूरा हुआ।इन तीस दिनों में उनका हर कदम नपा-तुला व एक अलग संदेश देने वाला रहा। उज्जैन में अपने घर रात बिताकर वर्षों से चले आ रहे एक मिथक को तोड़ा तो लाउड स्पीकर की तेज आवाज व खुले में मांस विक्रय पर रोक लगाकर,उन्होंने यह जता दिया कि मनमानी किसी की भी नहीं चलेगी। इन तीस दिनों में नई सरकार ने 45 आइएएस,11आइपीएस बदले। वहीं 9 कलेक्टर,3 एसपी व एक कमिश्नर को मैदानी पदस्थापना से हटाकर यह संदेश भी दिया कि स्वेच्छारिता अब वाकई बर्दाश्त नहीं होगी। सर्वाधिक चौंकाने वाला फैसला शाजापुर कलेक्टर किशोर कान्याल को लेकर रहा। जिन्होंने भरी मीटिंग में एक चालक की औकात पर सवाल खड़े किए। गुना बस हादसे में टीसी से लेकर सीएमओ तक जवाबदेही भी पहली बार तय हुई।

प्रशासनिक मामलों में संभागीय समीक्षा बैठकों का दौर शुरू कर मुख्यमंत्री ने यह साफ कर दिया कि सरकार सिर्फ भोपाल तक सीमित नहीं है। वातानुकूलित कक्षों के आदी हुए मंत्रालय व पुलिस मुख्यालय के अफसरों को भी संभागीय व जोन प्रभारी बनाकर निगरानी की नई व्यवस्था तैयार की। इस बदलाव से बताया गया कि संभागीय मुख्यालय अब सिर्फ डाकिए की भूमिका में नहीं,बल्कि मुख्य धारा में होंगे।उन्हें काम भी करना होगा और इसकी निगरानी भी होगी।

डीजे वालों को अपना काम करने व ‘मैं’ देख लूंगा का सियासी बयान सामने आने पर,अगले दिन ही डॉ.यादव ने अधिकारियों को डीजे वालों के लिए रोजगार के अवसर तलाशने के निर्देश देकर बता दिया कि जो देखना है..अब सिर्फ,वही देखेंगे। इसके इतर,राज्य मंत्रिमंडल के एक सदस्य ने पूर्ववर्ती सरकार पर सवाल उठाए तो उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के पांच बार पैर छूकर माफी मांगनी पड़ी। इन दो बातों से डॉ.यादव ने बताया कि सम्मान सबका रहेगा,लेकिन अपने कद का बेजा लाभ वह किसी को नहीं उठाने देंगे। यही नहीं,अपने हाव-भाव से ही उन्होंने उन बयानवीरों को भी खामोश कर दिया जो स्वयं को हिंदुत्व का बड़ा चेहरा साबित करने,आए दिन अपने बयानों से सुर्खियां बटोरते रहे।

सफलता का एक सूत्र वाक्य है—”समन्वय से सभी खुश रहते हैं।” बीते तीस दिनों में डॉ.यादव ने इस मंत्र को भी खूब अपनाया। वह पूर्व गृहमंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा के निवास पहुंचे तो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के घर भी। सुश्री उमा भारती से भी उन्होंने आशीर्वाद लिया तो शिवराज सिंह चौहान के निवास पर पहुंचकर भी सौजन्यता निभाई। मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर विभाग वितरण तक हर मामले में केंद्र का मार्गदर्शन लेना भी सबने देखा है। वहीं सीहोर बैठक में भागीदारी व वक्त की मांग के अनुरूप फैसले लेकर संगठन से बेहतर तालमेल का परिचय भी दिया।

इन तीस दिनों के दरम्यान डॉ.यादव की जो एक खास बात..वह,न किसी मामले में श्रेय लेने की होड़,न प्रशासनिक सर्जरी की कोई हड़बड़ी। जो जरूरी,सिर्फ वही बदलाव हुए। जनसंपर्क विभाग इसकी बानगी है।इसी तरह,सरकारी समारोहों में कन्या पूजन की परंपरा अनवरत जारी है,तो पुरानी योजनाओं को भी गतिमान बनाया जा रहा है। नियत तिथि पर 1.29 करोड़ लाड़ली बहनों के खातों में 15 सौ करोड़ की रकम डालकर उन्होंने जहां विपक्ष की बोलती बंद कर दी। वहीं, पेंशन धारकों व विशेष संरक्षित जनजाति वर्ग की महिलाओं को भी निराश नहीं होने दिया।कठिन आर्थिक हालात में इस बड़े बजट की व्यवस्था डॉ.यादव के कुशल वित्तीय प्रबंधन का परिचायक है।

नीतिगत मामलों की बात करें तो थानों की सरहदें तय कर इनका भूगोल बदलने व बीआरटीएस हटाने जैसे अहम् फैसले उन्होंने लिए। वहीं,सामाजिक न्याय क्षेत्र में तेंदूपत्ता बोनस की राशि में हजार रुपए का इजाफा कर पीएम मोदी की गारंटी को पूरा करने का काम भी किया। डॉ.यादव का एक माह का कार्यकाल यह बताने के लिए काफी है कि नई सरकार,नई सोच के साथ आगे बढ़ रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कोई ऐसी नजीर सामने आएगी जो आम आदमी का नजरिया बदलने वाली हो। केंद्र की तरह राज्य में भी ईमानदार व्यवस्था का अहसास हो। सुशासन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए भी यह बेहद जरूरी है। ताकि आम मतदाता यह महसूस करे कि उसका फैसला सही था।