MP: राजघराना अब जीत की गारंटी नहीं

20

सत्ता के गलियारे से …रवि अवस्थी
** विभाग की महिमा
चुनाव व सत्ता को लेकर कई तरह के मिथक है।उज्जैन में रात रुकने का मिथक हाल ही में नए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने तोड़ा। अब वह इछावर व अशोकनगर पहुंचने का मिथक भी तोड़ेंगे या नहीं,यह भविष्य की बात है।बहरहाल,विभागों को लेकर जारी मिथक इस बार भी अपना असर दिखा गया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने चौथी पारी में महिला एवं बाल विकास विभाग की कमान अपने पास रखी। वह जीतकर भी हार गए। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग वाले रामखेलावन पटेल तो विधानसभा ही नहीं पहुंच पाए। बहरहाल,डॉ मोहन यादव व जीतू पटवारी की लगी लॉटरी को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग को लेकर आगे होड़ मचना तय माना जा रहा है।

** भरोसे का संकट
बदले हुए निजाम के साथ शुरुआत में अक्सर भरोसे का संकट होता है।अब सूबे की ‘लाड़ली बहनों’का ही मामला लीजिए। योजना की अगली किस्त मिलने का भरोसा होना तो दूर,वे इस बात को लेकर भी आशंकित हैं कि किसान सम्मान निधि की तरह,कहीं पुरानी रकम ही अपात्र बताकर वापस न मांग ली जाए। इसके चलते बीते चार-पांच दिनों में ही बैंकों में योजना के खातों से रकम निकालने वालों की संख्या बढ़ गई है। यूं भी,किसी एक का भरोसा जीतना ही बढ़ी बात होती है। यहां तो बात लाखों की है। वह शिवराज ही जिन्होंने यह कमाल कर दिखाया। उनके हटते ही’बहनें’ जगह-जगह विलाप करती नजर आ रही है। बीच अगहन में यह भरोसा टूटा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि कम से कम चैत्र तक तो यह कायम रहे।

** राजघराना अब जीत की गारंटी नहीं
सियासत में सामंती दौर अब लगभग खत्म होने की कगार पर है। राजघराना चुनाव में जीत की गारंटी नहीं रहा। सुश्री मायासिंह,लक्ष्मण सिंह,राजवर्धन सिंह,नाती राजा,प्रियव्रत सिंह,प्रद्युम्न लोधी व टिमरनी से संजय शाह की पराजय इसकी बानगी हैं। संजय अपने 31 वर्षीय भतीजे अभिजीत से हारे। 16वीं विधानसभा के सबसे युवा चेहरा अभिजीत ने यह जीत सिर्फ अपनी मिलनसारिता व मेहनत के बलबूते हासिल की। वहीं ‘राजशाही’ हार गई। जयवर्धन भी ‘राम-राम’कर यानी बमुशिकल साढ़े पांच हजार वोट से जीते। पिछली बार राजघरानों के 14 सदस्य विधानसभा पहुंचे थे। इस बार यह संख्या 9 रह गई। दरअसल,देश आजादी के अमृतकाल में है। इन 76वर्षों में मतदाता की सोच बदली और सियासत का तौर-तरीका भी,लिहाजा राजघरानों के सियासतदारों को भी अब अपना अंदाज बदलना होगा।

** बदलाव की आंधी
सूबे की सियासी जमावट में अमूल-चूल बदलाव वर्षांत का सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना जाएगा। भाजपा के फैसलों को देख कांग्रेस भी उसी राह पर चल पड़ी। अंदाज भी वही,’एक झटके में पूरे घर के बदलने’वाला। यहां तक कि बदलाव की आंधी ने परिवारवाद की जड़ें भी उखाड़ फेंकी। लोकसभा चुनाव से पहले यह बदलाव किस ​दल को कितना नफा या नुकसान पहुंचाएगा,यह तो भविष्य के गर्त में है।अलबत्ता,इकलौती सीट पर काबिज कांग्रेस कह सकती है कि उसके पास तो खोने को बहुत कुछ है नहीं।असल समस्या बीजेपी की है,जो कईयों को जमीन दिखाकर क्लीन स्वीप की तैयारी में है।

** लोकसभा चुनाव का गुणा-भाग
विकसित भारत संकल्प यात्रा के साथ बीजेपी ने लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। उम्मीदवारों के लिए बीजेपी में चेहरों की कमी नहीं आई है। जो मंत्री रहते हारे,इस्तीफा देकर विधायक बने या जिनके सपने चूर हुए,उन्हें भी लड़ाया जा सकता है। इधर,कांग्रेस में ऊपरी तैयारी भले नजर न आ रही हो लेकिन अंदरखाने सीटों का गुणा-भाग शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि इकलौती सीट को बचाए रखने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने सांसद बेटे के साथ ही सीट की अदला-बदली कर सकते हैं। ‘प्रदेश’तो बचा नहीं,कम से कम लोकसभा सीट ही बची रहे।दिल्ली में रहने की एक सियासी वजह तो होगी। दिग्विजय सिंह जी को टेंशन नहीं है। वह राज्य सभा सांसद पहले से हैं। जयवर्धन सिंह विधायक बन ही चुके हैं। एक सीट परिवार के हाथ से गई है तो संभव है,लक्ष्मण सिंह जी को लोकसभा पहुंचाने की कवायद हो। भूरिया जी का गुणा-भाग भी कुछ ऐसा ही बताया जाता है।

** अब ‘बाप’ की एंट्री
2023 के विधानसभा चुनाव ने कई के समीकरण बदल डाले। सपा,बसपा और आप तो कोई कमाल दिखा नहीं सकी। इसके उलट एक नई नवेली पार्टी ‘बाप’ की एंट्री अवश्य हुई। BAP यानी भारत आदिवासी पार्टी। रतलाम जिले की सैलाना सीट से ‘बाप’के उम्मीदवार कमलेश्वर डोडियार ने कांग्रेस के सीटिंग विधायक हर्ष विजय गेहलोत को पराजित कर मप्र में पार्टी का खाता खोला। मूलत: राजस्थान में जन्मी ‘बाप’ ने मप्र में आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारे और पहले ही प्रयास में एक सीट के साथ विधानसभा में जगह बना ली। 33 वर्षीय कमलेश्वर लंबे संघर्ष व कड़ी मेहनत के बाद इस मुकाम तक पहुंचे। सूबे की सियासत की बड़ी मछलियों ने इस दल को तोड़ने के भी बहुत जतन किए। कई केस कमलेश्वर पर भी दर्ज हुए,लेकिन कहते हैं हौंसले से ही जीत है और कमलेश्वर ने यह साबित कर दिखाया।

** ऐसी भी क्या जल्दी?
माना कि लाड़ली बहना योजना पर आर्थिक संकट के बादल हैं,लेकिन सागर ग्रामीण के महिला एवं बाल विकास परियोजना अधिकारी ने इसे लेकर कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी दिखाई। उन्होंने चुनाव परिणाम आने के अगले दिन ही एक आदेश जारी कर अपात्रों को योजना से स्वत:बाहर हो जाने का फरमान सुना दिया।अब तत्कालीन घोषणाओं में पात्रता की कोई बंदिशें तो थी नहीं। ‘ जो आवे,सो पावे’ वाले अंदाज में इसे लागू किया गया। बहरहाल,आदेश को लेकर खलबली मची तो सागर कलेक्टर दीपक आर्य को 11वें दिन इस आदेश को निरस्त करना पड़ा।

** नाली का प्रावधान नहीं!
प्रदेश की एक अधिकारी शीर्षस्थ पद पर आसीन हुई तो राजधानी में जाटखेड़ी रोड की गोल्डन सिटी में उनके पड़ोसियों सहित आसपास के रहवासियों को भी अपनी कालोनियों के दिन बहुरने की उम्मीद जगी। दरअसल,कई महीनों से उखड़े यहां के एकमात्र पहुंच मार्ग को करीब एक फीट तक ऊँचा कर बनाया जा रहा है। रहवासियों का दर्द यह कि सड़क तो ऊँची हो गई,लेकिन नालियों की व्यवस्था नहीं होने से आसपास की कालोनियों में पानी का भराव होगा।इसके चलते कुछ लोगों ने मैडम से भी गुहार लगाई। पूछताछ पर जवाब मिला कि सड़क निर्माण के साथ नाली स्वीकृत नहीं है। नई व्यवस्था जोड़ भी लें तो बजट नहीं।अब ऐसे में नाली बनवा लो या सड़क।