Bhopal,सत्ता के गलियारे से ..रवि अवस्थी ** विचारधारा पर भारी महत्वाकांक्षा
करीब दो महीने पहले बीजेपी में वापसी करने वाले रीवा के अभय मिश्रा ने पुन:पाला बदल लिया।हाल ही में कांग्रेस के सिद्धार्थ तिवारी ने बीजेपी का दामन थाम लिया।उनके पिता व दादा खालिस कांग्रेसी रहे,लेकिन तीसरी पीढ़ी की विचारधारा अचानक बदल गई। कुछ ऐसे भी हैं,जो खुद को टिकट नहीं मिलने पर पूरे जिले से अपनी ही पार्टी को हराने की बात कह रहे हैं।
बीसियों उदाहरण हैं,जिनकी आस्था इस चुनाव में कपड़े की तरह बदल रही है। यानी अवसरवादिता,विचारधारा व सिद्धांतों पर पूरी तरह हावी है। जो लोग नेता बनाने वाली अपनी पार्टी के नहीं,वे जनप्रतिनिधि चुने भी गए तो क्या मतदाताओं के’सगे’रहेंगे?
** कांग्रेस की कपड़ा फाड़ राजनीति
विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ व पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच जारी मनभेद एक बार फिर सतह पर आ गया। बात कपड़ा फाड़ने तक जा पहुंची। मौका चुनाव का है,लिहाजा इस मामले में तत्काल डेमैज कंट्रोल हुआ। इस पर यह बात भले आई-गई हो गई,लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं पर वरिष्ठ नेताओं के इस संवाद का गहरा असर हुआ।टिकट वितरण के बाद उपजा कपड़ा फाड़ आक्रोश इसकी बानगी है। गनीमत यह रही,कि वरिष्ठ नेताओं के कुर्ते सही सलामत रहे।
वैसे कांग्रेस में कपड़ा फाड़ राजनीति नई बात नहीं है। विधानसभा के पिछले सत्रों के दौरान विधायक पांचीलाल मेड़ा व जयवर्धन सिंह इसका प्रभावी प्रदर्शन कर चुके हैं।यहां तक कि मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह भी छत्तीसगढ़ में अपना कुर्ता फटवा बैठे थे। वाकया 31 अक्टूबर 2000 को पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व.विद्याचरण शुक्ल के फॉर्म हाउस का है। जब दिग्विजय,अजीत जोगी को नवगठित राज्य का मुख्यमंत्री बनवाने वहां पहुंचे थे और शुक्ला समर्थक कार्यकर्ताओं के आक्रोश का शिकार हुए।
** पुरस्कार में भी राजनीति
राजनीति प्राय: हर क्षेत्र में पैर पसार चुकी है। विविध क्षेत्रों में दिए जाने वाले पुरस्कार भी इससे अछूते नहीं रहे। मप्र कांग्रेस ने हाल ही में अपने चुनावी वचन पत्र में पत्रकारिता के क्षेत्र में सुविख्यात कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के नाम पर पुरस्कार देने की घोषणा की। इसके बहाने कांग्रेस ने ग्वालियर के सिंधिया परिवार पर निशाना साधने की कोशिश की है।
बीते 6 माह में यह दूसरा मौका है जब कांग्रेस ने सुभद्रा कुमारी चौहान का जिक्र छेड़ा है। इसी साल अप्रैल में ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच ट्विटर (अब X) पर एक वाकयुद्ध छिड़ा था। इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री ने ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए सिंधिया परिवार पर तंज कसा था। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी शायद ही कभी सोचा हो कि’झांसी की रानी लक्ष्मीबाई’की वीरगाथा को लेकर लिखी गई उनकी एक कविता कभी मप्र की राजनीति का हिस्सा बनेगी।
** ‘नारी सम्मान’के बीच निकाला रास्ता
राजनीति में मतभेद भले ही हों,लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए। प्रदेश की दो दलीय राजनीति में यह तालमेल
लंबे अर्से से कायम है। प्रदेश की दर्जनभर से अधिक सीटों पर तालमेल के साथ तय प्रत्याशी इसकी बानगी है। चाचौड़ा में बीजेपी प्रत्याशी का लाख विरोध हुआ,लेकिन पार्टी ने अपना उम्मीदवार नहीं बदला।
ऐसे ही कांग्रेस ने सांवेर,रहली,खुरई,बुधनी जैसी दर्जनभर से अधिक सीटों पर नए-नवेले उम्मीदवारों को उतारकर सौजन्यता का परिचय दिया है। कांग्रेस ने सागर जिले की आधी सीटों पर सिर्फ महिला शक्ति पर भरोसा जताया।
**अखिलेश को गुस्सा क्यों आया?
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव हाल ही में प्रदेश के चुनावी दौरे पर आए,लेकिन सत्तारुढ़ दल से ज्यादा अपने गठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस से खफा दिखे। इतने कि प्रदेशस्तरीय नेताओं के लिए हल्के शब्दों का उपयोग तक कर बैठे। वहीं यूपी कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष को भी उनकी हैसियत दिखा दी।
बकौल,अखिलेश कांग्रेस ने सपा को प्रदेश में छह सीटें देने का वायदा किया था,लेकिन सिर्फ धोखा मिला। इधर,जवाब में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने भी अपनी प्रतिक्रिया में अखिलेश को कोई सम्मान नहीं दिया। यानी I.N.D.I.A.में वक्त से पहले आई यह दरार लोकसभा चुनाव तक कहीं खाई में न बदल जाए।
** आधी आबादी,पूरा सच
सियासत में धर्म व जाति का गणित फीका पड़ा तो राज्य के दोनों प्रमुख दलों का फोकस सूबे की आधी आबादी पर हो गया। इनके कल्याण को लेकर बढ़-चढ़कर घोषणाएं हुईं,लेकिन चुनावी टिकट के मामले में दोनों ही दल एक बार फिर तंगदिली दिखा गए। बीजेपी ने 28 तो कांग्रेस ने अब तक सिर्फ 29 महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया। यह संख्या 12 से 13फीसद है जबकि दावे 33 फीसद की हो रहे हैं।
इसी तरह,ओबीसी उम्मीदवार उतारने के मामले में भी कांग्रेस पिछड़ गई है। विरोध में पार्टी ओबीसी प्रकोष्ठ प्रदेशाध्यक्ष दामोदर यादव ने अपना इस्तीफा दे डाला। जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ‘जिसकी जितनी आबादी,उसका उतना हक’ की बात कहते हुए जातिगत जनगणना की मांग करते रहे हैं।
** युवा नेता कौन?
मप्र कांग्रेस में युवाओं का नेता बनने को लेकर छिंदवाड़ा सांसद नकुलनाथ का एक बयान कुछ साल पहले खासा चर्चा में रहा था। इसमें उन्होंने स्वयं को वास्तविक युवा नेता बताया था,लेकिन मौजूदा चुनाव में पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह इस मामले में बाजी मारते नजर आए।
टिकट वितरण से पहले भी दिग्विजय के साथ जयवर्धन का नाम पार्टी प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ की जुबान पर रहा तो टिकट बंटने पर विरोधियों ने अन्य नेताओं के साथ जयवर्धन के भी पुतले फूंके। वहीं नकुलनाथ की चर्चा सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र के 3 प्रत्याशियों की घोषणा वक्त से पहले कर देने को लेकर ही रही।
** इनके गठबंधन ने बढ़ाई चिंता
बहुजन समाज पार्टी व गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की विचारधारा व कार्यशैली भले ही अलग हो,लेकिन मौजूदा चुनाव में इनका गठबंधन चर्चा में है। चरैवेति,चरैवेति कभी बीजेपी का ध्येय मंत्र रहा,अब गोंगपा इस मंत्र पर चल रही है।पिछले चुनाव में 2.5 प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाली जीजीपी की ताकत को 5 फीसद वोट पाने वाली बसपा ने पहचाना। वर्ष 2018 में दोनों ही दलों ने 26 लाख से अधिक मत हासिल कर कई सीटों पर बीजेपी,कांग्रेस के समीकरण बिगाड़े थे।
**’लाड़ली बहना’ ने बिगाड़ा बजट
प्रदेश के तमाम विभाग भले ही चुनाव के चलते राहत महसूस कर रहे हों,लेकिन वित्त विभाग की हालत पतली है। वित्तीय अधिकारियों को दिन रात दिन इसी माथापच्ची से गुजर रहा, कि कैसे दस तारीख यानी लाड़ली बहना दिवस की व्यवस्था की जाए। बताया जाता है कि सवा करोड़ लाड़ली बहनों के खातों में ही रकम डालने हर माह 15 सौ करोड़ से अधिक चाहिए। दीगर बढ़ाए गए करोड़ों के खर्च अपनी जगह हैं। इस पर लंबित भुगतान के देयकों का वजन कोषालय में दिनोंदिन बढ़ रहा है।
चुनाव है,लिहाजा राजस्व अर्जन की रफ्तार भी कछुआ से धीमी बनी हुई है। आलम यह कि खेल विभाग को अपना खर्चा चलाने खिलाड़ियों की अवॉर्ड की रकम में चुंगी लगानी पड़ रही है। हालांकि सूबे के खेल विभाग की महिमा न्यारी है। जहां लगभग हर खिलाड़ी आर्थिक शोषण का शिकार है। खेल मंत्री का भी’खेल’पर ही ज्यादा जोर रहा है। आगे कोई ‘ ईमानदार’मिल जाए तो यह प्रदेश के खिलाड़ियों का सौभाग्य होगा। लंबित भुगतान की अदायगी हो या खिलाड़ियों की शोषण से मुक्ति,फिलहाल नई सरकार बनने तक तो इंतजार करना ही होगा।
..और मन की बात मन में ही रह गई
मौका था,शनिवार को राजधानी में आयोजित पुलिस महकमे के शहीद स्मृति दिवस समरोह का। राज्यपाल मंगुभाई पटेल कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे। कार्यक्रम में कई शहीदों के परिजन इस आस में जुटे कि उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। किसी को अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिली,तो किसी को आर्थिक सहायता। मंच से संचालक कर्ता ने घोषणा भी की,मुख्य अतिथि कार्यक्रम के बाद शहीदों के परिजनों से मुलाकात करेंगे । राज्यपाल को पीएम के कार्यक्रम में शामिल होने ग्वालियर पहुंचने की जल्दी में थे,लिहाजा एक परिजन से चलते..चलते बात की और आगे बढ़ गए। बाकी मन मसोस कर रह गए। जानकारों की मानें तो आयोजकों ने बीते साल की घटना को ध्यान में रखते हुए भी इस मामले में एहितयात बरता। जब गुना के एक शहीद पुलिस कर्मी के परिजनों ने कार्यक्रम स्थल पर हंगामा खड़ा कर दिया था।
..कि सरकार चुनाव ड्यूटी पर है
चुनाव में आचार संहिता के जारी रहते करीब दो माह तक दीगर सरकारी कामकाज आमतौर पर ठप ही रहते हैं। वजह कई हैं और कुछ बहानेबाजी से पैदा की जाती हैं। इस पर त्योहारी छुट्टियों ने प्रशासनिक तंत्र की और ‘पौबारह’ कर दी। यह सप्ताह पूरा अवकाश में गुजरना है..शनिवार,रविवार की दो दिनी छुट्टी के बाद सोमवार को ऐच्छिक अवकाश,मंगलवार को दशहरा,बुधवार को स्थानीय अवकाश फिर शनिवार,रविवार..गुजर गया हफ्ता। नवंबर में भी हालात कुछ इसी तरह के रहने हैं।
** यह भी खूब रही…
मामला नीमच का है। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता का पालन कराने प्रशासन सक्रिय हुआ। चुनाव आयोग की कार्रवाई का ऐसा भय कि तमाम पोस्टर,बैनर हटाने के साथ ही थोकबंद हुए भूमिपूजन के शिलालेख भी ढक दिए गए। नीमच में ऐसे ही एक शिलालेख को ढकने प्रशासनिक अमले ने अखबारी कागज का इस्तेमाल किया,लेकिन अखबार के जिन पन्नों का उपयोग हुआ,उनमें शिवराज सरकार की उपलब्ध्यिां गिनाने वाली खबरें और फोटो भरे पड़े थे। यानी जो काम शिलालेख नहीं कर पा रहा था,वह अखबार के पुराने पन्नों ने कर दिया।अब प्रतिद्वंदी इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बता संबंधित पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
















