Bhopal,सत्ता के गलियारे से…रवि अवस्थी// मप्र विधानसभा चुनाव में अब डेढ़ दो माह का वक्त है। प्रदेश में चुनावी राजनीति सरगर्म है। दिग्गज व उनके समर्थक मैदान में हैं। ऐसे में राजनेताओं के बयान से प्रदेश की सियासत सरगर्म है। इसी पर आधारित है..सत्ता के गलियारे से साप्ताहिक कॉलम। इसमें बीते सप्ताह की सियासी गतिविधियों की समीक्षा का एक प्रयास…पढ़िए।
**सिंधिया का फ्रंट फुट : मप्र में चुनाव का मौसम है तो राजनेताओं के बयान भी खास मायने रखते हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संकेत दिए हैं कि सियासत में भी उन्हें क्रिकेट की तरह फ्रंट फुट पर खेलना पसंद है। अपने स्वर्गीय पिता माधवराव सिंधिया की 22वीं पुण्यतिथि पर ग्वालियर पहुंचे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सियासत की तुलना क्रिकेट बेटिंग से की। उन्होंने कहा कि सियासत में भी क्रिकेट की तरह फ्रंट फुट पर खेला जाता है। 
सांसदों को चुनाव लड़ाए जाने के सवाल पर सिंधिया ने भी संकेत दिए कि मुझे जो आदेश मिलेगा उसे मैं पूरा करुंगा। बीजेपी नेतृत्व ने अब तक 8 बड़े चेहरों को चुनाव मैदान में उतारकर फ्रंट फुट पर खेलने की पहले ही कई पिच तैयार कर दी हैं। चुनाव बाद कौन फ्रंट फुट पर रहकर हुक करेगा और कौन होंगा स्टंपिंग,यह भविष्य के गर्त में है। फिलहाल तो कयास यही कि फ्रंट फुट पर खेलने वाले और कितने चेहरे चुनावी पिच पर नजर आएंगे।
** उनके दिल में सिर्फ दिल्ली
कार्यकर्ता महाकुंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण पूरी तरह स्वकेंद्रित होने के कई मायने निकाले जा रहे हैं। प्रदेश भाजपा भले कहे कि ‘मप्र के मन में मोदी और मोदी के मन में मप्र ‘…,लेकिन उनके भाषण ने बता दिया कि ‘दिल्ली भले ही दूर’ है लेकिन उनके दिल में तो वही बसती है।
पीएम के भाषण में मप्र उपलब्धियों को जगह नहीं मिलने पर सीएम शिवराज को लेकर कई तरह के कयास भी शुरू हुए लेकिन इन कयासों के बीच यह भुला दिया गया कि संबंधित बैकफुट पर ही सही,लेकिन अपनी’टिकाऊ बल्लेबाजी’से अब तक कईयों के छक्के छुड़ा चुके हैं।
कुछ तो ऐसे हैं जो लंबे समय से पैवेलियन में अपनी बारी का इंतजार करते बैठे रह गए। यही नहीं, पारी के दरम्यान शिवराज कई अद्भुत ‘मास्टर स्ट्रोक्स’ लगाकर प्रदेश की जनता के’मि.भरोसेमंद’ भी बन बैठे। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करने की गल्ती पार्टी शायद ही करे।
** क्या बंद रखूं,क्या चालू
मप्र के मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अगली सरकार के लिए इतनी व्यवस्था कर दी,कि उसे कुछ ज्यादा नया नहीं करना पड़ेगा।मुख्यमंत्री ने बीते साढ़े तीन महीनों में ही 25 हजार करोड़ से ज्यादा की नई योजनाएं,घोषणाएं की तो लाख-करोड़ से अधिक के विकास कार्यों की आधारशिला रख दी।
अगले मुख्यमंत्री शिवराज रहे तब तो ठीक,वर्ना नई सरकार के कम से कम साल छह महीने तो इसी उलझन में गुजरना है कि किस योजना को बंद किया जाए और किसे चालू रखा जाए। जब आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया हो तो नए मुखिया को शिवराज जी से पूछना ही पड़ेगा कि भैया,उस खजाने की चाबी तो बता दो जिसके भरोसे आप कहते रहे कि मैं ढपोरशंख नहीं,मेरे पास विकास के लिए पैसे की कमी नहीं।
** ‘सन्नाटे’में मप्र बीजेपी
केंद्रीय गृह मंत्री के दौरे का खुलासा होते ही प्रदेश बीजेपी के कर्णधार जैसे अचानक जाग गए। दो दिन पहले देर शाम आनन फानन में बैठक बुलाई गई। इसमें तय हुआ कि इस बार चुनाव पूर्व की रायशुमारी परंपरा का तो निर्वहन ही नहीं हुआ! बहरहाल,20-25 साल का अनुभव रखने वाले नेताओं को निर्देशित किया गया कि वे तत्काल जिलास्तरीय बैठक कर फीडबैक हासिल करें,ताकि शाह के समक्ष कुछ तो जमीनी रिपोर्ट साझा की जा सके।
निर्देशित नेता भी तत्काल जिलों के लिए रवाना हुए। राहत की बात यह रही कि शाह का दौरा फिलहाल टल गया और जो काम 24 से 48 घंटे में करना था,उसके लिए कुछ दिन की मोहलत और मिल गई। लेकिन बड़ा सवाल यही कि क्या फिर, 79 नाम बिना रायशुमारी के घोषित हो गए..?
कैडर बेस पार्टी कही जाने वाली बीजेपी,संगठन से जुड़े हर काम को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए जानी जाती है,लेकिन 2023 के चुनाव की बात ही कुछ अलग है। लिहाजा पार्टी की प्रदेश इकाई भी इस बार कुछ अलग ही नजर आ रही है।
**एक रणनीति यह भी
सियासी दांव पेंच में बीजेपी का कोई सानी नहीं। प्रदेश में क्षत्रपों को चुनाव मैदान में उतारकर उसने सभी को चौंकाया।अपनी इस रणनीति से उसने प्रतिद्वंदियों की मुश्किलें तो बढ़ाई ही,से अपनों को कम नहीं चौंकाया।
जानकारों की मानें तो क्षत्रपों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा कर उसने एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया। एक तो जिसके जितने विधायक जीते,वह उतना बड़ा दावेदार।
प्रदेश का मुखिया तो वही होगा,जिसे केंद्रीय नेतृत्व चाहेगा। दूसरे लोकसभा चुनाव के लिए कई चुनौतियों को समय रहते दूर कर लिया गया।
** अतीत को भुलाया
सुखद भविष्य के लिए अतीत से अधिक वर्तमान पर जोर होना चाहिए। शायद यही वजह है कि शाजापुर जिले के कालापीपल पहुंचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ओबीसी वर्ग पर फोकस किया। उन्होंने दावा भी किया कि कांग्रेस देश,प्रदेश में सत्ता में आई तो इस वर्ग की सबसे बड़ी हितैषी उन्हीं की पार्टी होगी।
लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है। प्रदेश की ही बात करें तो उन्होंने मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ को आगे भी सर्वेसर्वा बने रहने के संकेत भी दिए। नाथ तो ओबीसी से हैं नहीं। अतीत में भी पार्टी में ब्राह्मण,जैन व ठाकुरों का दबदबा रहा। मप्र में 4 दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस के दौर में 20 साल ब्राह्मण,18 साल ठाकुर व तीन साल जैन मुख्यमंत्री हुए। वहीं बीजेपी के करीब 25 साल के शासन में एक ब्राह्मण,दो जैन व 3 ओबीसी मुख्यमंत्री हुए।
दिग्विजय शासनकाल में ओबीसी चेहरे के तौर पर सुभाष यादव को उप मुख्यमंत्री बनाने का दबाव बड़ा तो समानांतर व्यवस्था करते हुए आदिवासी चेहरे के तौर पर जमुनादेवी को भी इसी पद से नवाज दिया गया। 15 साल बाद सत्ता में वापसी पर ओबीसी की सियासत भी शुरू की तो विधेयक लाने में ऐसी चूक कर गए कि यह अदालत में चुनौती का विषय बन गई। हालात ऐसे बने कि 27 % के फेर में ओबीसी 14 % से भी हाथ धो बैठे। बहरहाल,अतीत को भुलाकर आगे बढ़ने में ही भलाई है।
**अब यह सियासत नहीं तो क्या?
देश में कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल लगातार जातिगत जनगणना पर जोर दे रहे हैं। मप्र दौरे पर आए कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो मौजूदा पीएमओ में कार्यरत अधिकारियों की जातिगत आधार पर गिनती भी गिना गए। यही नहीं,उन्होंने दावा किया कि मैं जातिगत जनगणना की बात करता हूं तो पीएम मोदी कांपने लगते हैं।
हैरत की बात यह कि कांग्रेस ने उस रिपोर्ट का न तो स्वयं उजागर किया न मौजूदा सरकार से ऐसा करने की मांग की जो वर्ष 2011 में तत्कीन यूपीए सरकार ने तैयार कराई थी। सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना यानी एसईसीसी पर तब 4389 करोड़ रुपए भी सरकार ने खर्च किए। रिपोर्ट आई लेकिन ठंडे बस्ते में दफन होकर रह गई।
नई जनगणना 2025 से पहले हो पाने के आसार नहीं है। तब क्यों न,मनमोहन सरकार की एसईसीसी रिपोर्ट को जातिगत गणना का आधार मान लिया जाए। ऐसा होता है तो जातिगत गणना के लिए देश को वर्ष 1931 के सेंसस पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा। इसके इतर,नई गणना पर जोर देना,सियासत नहीं तो और क्या है?
** ट्रेनिंग में खोट या लापरवाही
भारतीय प्रशाासनिक व पुलिस सेवा में भीड़ प्रबंधन प्रशिक्षण का अहम् हिस्सा है। ग्वालियर में गुर्जर आंदोलन व उमरिया के गोंगपा प्रदर्शन ने जो हिंसक स्वरूप अख्तियार किया..उसके आगे प्रशासन बेबस नजर आया। इससे पहले भी ऐसे नजारे कई जगह देखे जा चुके हैं। अब या तो लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की ट्रेनिंग व्यवस्था में खोट है,या प्रशिक्षण को औपचारिकता के तौर पर लेने वालों में।
वर्ना क्या वजह है कि जिम्मेदार अधिकारी न तो समय रहते स्थिति को भांप सके,न भीड़ के उग्र होने पर हालात को ही संभाल पाए और अपने ही दफ्तर में तोड़फोड़,मारपीट करवा बैठे। कुछ ऐसे ही अव्यवस्था के हालात शनिवार को राजधानी के पुराने शहर में भी वायुसेना के एयर शो बने।
गनीमत यह रही कि सिर्फ टिन की एक छतरी टूटनेभर का हादसा हुआ। इस शो के दौरान वायुसेना ने आकाश में जितने व्यवस्थित तरीके से अपने करतब दिखाए,जमीन पर उतनी ही अव्यवस्था रही।
















