भोपाल(Janprachar.com)। चुनाव में प्रत्याशी का चिन्ह और उसकी पार्टी दोनों ही बेहद अहम हैं। कई बागियों ने पार्टी छोड़ निर्दलीय या दूसरे दल से चुनाव लड़ा लेकिन उनकी वह वक्त नहीं रही जो कभी उनकी मूल पार्टी में हुआ करती थी। राजनीतिक दलों के लिए उसकी प्रतिष्ठा भी बेहद मायने रखती हैं।

हाल ही में केंद्रीय चुनाव आयोग ने एनसीपी, टीएमसी और सीपीआई से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छीना तो इस दल के नेताओं के होश उड़ गए।वहीं आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने पर उसके नेताओं की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा।कुछ यही हाल चुनाव चिन्ह का है…महाराष्ट्र में दो फाड़ हुई शिवसेना के बीच चुनाव चिन्ह की लड़ाई तो सबने देखी,सुनी है।
बहरहाल,हम यहां बात कर रहे 138 साल पुरानी पार्टी कांग्रेस के चुनाव चिन्ह ‘हाथ के पंजा’ की..आजादी के बाद ही कांग्रेस के चुनाव चिन्ह में 2 बार बदलाव हुए। ‘हाथ का पंजा’ उसका तीसरा चुनाव चिन्ह है।स्वतंत्र भारत में अब तक हुए 17 आम चुनावों में, कांग्रेस ने 7 मौकों पर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और 3 बार सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व किया।
कांग्रेस 54 से अधिक वर्षों तक केंद्र सत्ता में रही। इस दौरान उसके 6 प्रधानमंत्री रहे । पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू (1947-1964), और सबसे हाल के डॉ मनमोहन सिंह (2004-2014)। वर्ष 1964 में उनकी मृत्यु तक, जवाहरलाल नेहरू पार्टी के सर्वोपरि नेता थे।
वर्ष 1963 में पं.नेहरू के जीवन के अंतिम वर्ष के दौरान दक्षिण के कुमारस्वामी कामराज अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। 1964 में पंडित नेहरू का निधन होने पर बागडोर लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में आ गई,लेकिन दो साल बाद संदिग्ध परिस्थितियों में ताशकंद में उनका निधन हो गया। तब पार्टी के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई का दरकिनार कर श्रीमती इंदिरा गांधी कांग्रेस की मुखिया बन गईं। इस दौरान पार्टी में मतभेदों के चलते इसके कई घटक दल उड़ीसा जन कांग्रेस,बांग्ला कांग्रेस,उत्कल कांग्रेस और भारतीय क्रांति दल बने।
देखा जाए तो 1966 में इंदिरा युग की शुरुआत हुई। तब कांग्रेस के अध्यक्ष बने एस. निजलिंगप्पा। नवंबर 1969 में अनुशासनहीनता के एक मामले में निजलिंगप्पा ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
इससे गुस्सा इंदिरा ने पार्टी का अपना एक अलग गुट बनाया। इसे नाम दिया गया कांग्रेस (आर)। वहीं निजलिंगप्पा की अध्यक्षता वाली मूल पार्टी तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (ओ) के रूप में जानी गई। यहीं से शुरू हुई चुनाव चिन्ह की लड़ाई । दरअसल,आजादी के बाद कांग्रेस का चुनाव चिन्ह रहा जुआ ले जाती ‘दो बैलों की जोड़ी’।
यह चिन्ह मूल कांग्रेस के खाते में ही रहा। वहीं कांग्रेस(आर) को चुनाव चिन्ह मिला ‘गाय और बछड़ा’। इस चुनाव चिन्ह के साथ इंदिरा गुट की कांग्रेस (आर) अधिक मजबूत हुई और सत्ता में भी रही..लेकिन इसी दौरान 1975 में 21 महीने के लिए देश में आपातकाल लागू करना कांग्रेस (आर) को महंगा पडा..
1977 के चुनाव में उसे जनता पार्टी के हाथों बुरी तरह शिकस्त खानी पड़ी..इस चुनाव में कांग्रेस के कुल 153 सांसद जीते लेकिन सत्ता जाने पर इनमें से 76 ने इंदिरा का साथ छोड़ दिया..वर्ष 1978 में कांग्रेस पुन: दो गुटों में बंट गई…इंदिरा गांधी ने अपने गुट को कांग्रेस (आई) नाम दिया और अपनी अलग पार्टी बना ली..
चुनाव चिन्ह को लेकर दोनों गुटों में खींचतान मची तो मामला एक बार फिर से चुनाव आयोग तक जा पहुंचा। इस लड़ाई में इंदिरा गुट से एक बार फिर मूल चुनाव चिन्ह छिन गया..जानकारों की माने तो यह चिन्ह छिनने से तब श्रीमती गांधी ने राहत ही महसूस की थी..दरअसल, उस वक्त ‘गाय और बछड़े’ के चिन्ह को इंदिरा और उनके बेटे संजय गांधी से जोड़कर मजाक बनाया जा रहा था…इसके चलते श्रीमती गांधी स्वयं चुनाव चिन्ह में बदलाव चाहती थीं..
फिर नहीं मिल सका पुराना चुनाव चिन्ह
बताया जाता है कि चुनाव चिन्ह की इस लड़ाई में श्रीमती गांधी कांग्रेस का सबसे पुराना चिन्ह ‘दो बैलों की जोड़ी’ फिर से वापस चाहती थीं..लेकिन उसे चुनाव आयोग ने फ्रीज कर दिया था…
नए चुनाव चिन्ह के लिए कांग्रेस (आई) के तत्कालीन महासचिव बूटा सिंह ने चुनाव आयोग में अर्जी दी….
उन्हें चुनाव निशान के तौर पर तीन नाम सुझाए गए… हाथी, साइकिल और हाथ का पंजा। बूटा सिंह को इनमें से एक विकल्प चुनना था। यह फैसला वह स्वयं नहीं कर सकते थे , लिहाजा उन्होंने तब दिल्ली से दूर विजयवाड़ा में मौजूद इंदिरा गांधी को फोन लगाया। इंदिरा गांधी से साथ उस वक्त पीवी नरसिम्हा राव भी थे।
बताया जाता है कि बूटा सिंह फोन पर जब इंदिरा गांधी को तीसरे विकल्प ‘हाथ’ के बारे में बता रहे थे तो बूटा सिंह के पंजाबी लहजे के कारण श्रीमती गांधी को हाथ की जगह ‘हाथी’ सुनाई दिया । तब उन्होंने ‘हाथी’ लेने से मना कर दिया। तब तक बूटा सिंह भी गड़बड़ी को भांप चुके थे। वह लगातार अपनी बात कहते रहे तब श्रीमती गांधी ने फोन का रिसीवर नरसिम्हा राव को थमा दिया।
कई भाषाओं के जानकार नरसिम्हा राव समझ गए कि बूटा सिंह क्या कहना चाहते हैं। स्थिति स्पष्ट होते ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने ‘हाथ के पंजे’ को लेकर हामी भरी और कांग्रेस के नए चुनाव चिन्ह का फैसला हो गया।
तब से अब तक कांग्रेस इसी चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ती रही है। हालांकि चुनाव आयोग ने जो दो अन्य विकल्प बूटा सिंह को सुझाए थे उनमें बाद में ‘हाथी’ बसपा और ‘साइकिल’ सपा का चुनाव चिन्ह बने और ये दोनों ही दल भी भारतीय राजनीति में चमके।
हाथ के पंजे को लेकर एक और प्रसंग
कांग्रेस के मौजूदा चुनाव चिन्ह को लेकर एक और प्रसंग है। बताया जाता है कि 1977 में देश से इमरजेंसी खत्म होने के बाद रायबरेली से इंदिरा गांधी चुनाव हार गई। इसके बाद इंदिरा कांचि कामकोटि के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती से मिलने गईं। वह काफी देर तक शंकराचार्य से अपनी बात कहती रहीं। लेकिन शंकराचार्य ने उनकी एक भी बात का जवाब नहीं दिया।
अंततः इंदिरा ने विदा होने से पहले हाथ जोड़ कर जैसे ही अपना सिर उनके आगे झुकाया शंकराचार्य ने दाहिना हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। बताते हैं कि तब श्रीमती गांधी ने तत्काल इसी हाथ (पंजा) को अपना चुनाव चिह्न बनाने का फैसला कर लिया था।
श्रीमती गांधी और शंकराचार्य की इस मुलाकात के बारे में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन भास्करराव ने भी अपनी जीवनी में बहुत विस्तार से इस घटनाक्रम का उल्लेख किया है।