Narela,Bhopal Constituency : जहां ब्राह्मण मतदाताओं पर ही सारा दारोमदार

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“वर्ष 2008 में भोपाल की उत्तर व गोविंदपुरा विधानसभा सीट के कुछ हिस्सों को अलग कर नरेला नई विधानसभा सीट बनी…कालांतर में सियासी जतन कुछ ऐसे रहे कि यह सीट भोपाल की एक और अल्पसंख्यक बाहुल्य सीट बन सके..लेकिन विधि का विधान तो कुछ और ही है..बीते तीन चुनाव से इस सीट पर बीजेपी के ​विश्वास सारंग का कब्जा है.. लेकिन कांग्रेस के युवा नेता मनोज शुक्ला ने बीते कुछ महीनों में ब्राह्मण व गरीब मतदाता तबके में सेंध लगाकर 2023 के चुनावी समीकरण को जटिल बना दिया है..सारा ‘दारोमदार’ ,ब्राह्मण मतदाताओं पर है। ये जिसके पाले में रहे,इस सीट का अगला ‘सिकंदर’ वही होगा..”

रवि अवस्थी,भोपाल। राजधानी भोपाल की किसी विधानसभा में यदि सर्वाधिक विकास कार्य हुए तो वे हुजूर के बाद नरेला में…नरेला क्षेत्र की दशा व दिशा सुधारने का काम बीते डेढ़ दशक से जारी है..नर्मदा का पानी सबसे पहले इसी क्षेत्र के रहवासियों को मिला तो इसका श्रेय प्रदेश भाजपा के कद्दावर युवा नेता एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग को जाता है..

विश्वास को राजनीति अपने पिता एवं भाजपा के संस्थापकों में एक स्व.कैलाश नारायण सारंग से विरासत में मिली..इसके चलते वे राजनीति के आज हर दांव-पेंच बखूबी समझते हैं..इसके चलते वह नरेला में ‘कमल’ खिलाते रहे हैं..लेकिन कांग्रेस सहित अन्य दलों व नेताओं ने नरेला को बतौर प्रयोगशाला इस्तेमाल किया..लेकिन उनके सभी प्रयोग बीजेपी के आगे असफल रहे.. 2023 के चुनाव में किसका प्रयोग होगा सफल..इसे समझने से पहले जानते हैं इस सीट का सियासी सफर..
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वर्ष 2008 में अस्तित्व में आई नरेला सीट
अब तक हुए तीनों चुनाव में खिला कमल
बीजेपी का गढ़ कही जाती है नरेला सीट
2 बार से मंत्री हैं क्षेत्र के विधायक सारंग
हुजूर के बाद सर्वाधिक विकास नरेला में
नरेला को मिला सबसे पहले नर्मदा जल
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सारंग ने बहाई ‘विकास की गंगा’

राजधानी का मौजूदा नरेला क्षेत्र कभी भोपाल उत्तर व गोविंदपुरा सीट का हिस्सा हुआ करता था..इस इलाके का विस्तार हुआ और आबादी बढ़ी तो 2008 में नरेला नई विधानसभा बनी और इलाके के गांव के नाम पर इसका नामकरण हुआ..तब नरेला,सेमरा भोपाल की सीमा से सटे गांव थे..जो अब किसी पाश एरिया में तब्दील हो चुके हैं..

इसका श्रेय जाता है,इस सीट से तीनों बार के बीजेपी विधायक एवं मंत्री विश्वास सारंग को..एक ऐसा नाम जिसने अल्प समय में प्रदेश की राजनीति में बेहतर मुकाम हासिल किया..राजनीति उन्हें विरासत में मिली और नरेला सीट से तीन चुनाव लगातार लड़कर इलाके के हर सियासी दांव पेंच के जानकार भी बने..

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नरेला सीट के अब तक के परिणाम

वर्ष            जीते      दल         हारे        दल     मार्जिन
2008- विश्वास सारंग- बीजेपी -सुनील सूद – कांग्रेस-  3,273
2013- विश्वास सारंग -बीजेपी -सुनील सूद – कांग्रेस- 26,970
2018 -विश्वास सारंग -बीजेपी- महेंद्र चौहान- कांग्रेस- 23,151

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अब तक हुए तीनों चुनाव में यहां बीजेपी,कांग्रेस उम्मीदवारों के बीच कड़ी टक्कर रही…पहले यानी 2008 के चुनाव में उनका मुकाबला पूर्व महापौर एवं कांग्रेस उम्मीदवार सुनील सूद से हुआ..तब सारंग को 57 हजार 75 और सूद को 53 हजार 802 वोट मिले..इस चुनाव में सारंग को महज 3 हजार 273 मतों से जीत हासिल हुई..

पहले चुनाव में सीट की नब्ज भांप चुके बीजेपी उम्मीदवार ने 2013 के चुनाव में कांग्रेस के सुनील सूद को करीब 27 हजार मतो से शिकस्त दी..तीसरा यानी 2018 में उनका मुकाबला कांग्रेस के डॉ महेंद्र सिंह चौहान से हुआ..चौहान के लिए यह क्षेत्र एकदम नया रहा..बावजूद इसके वह 85 हजार 503 मत हासिल करने में सफल रहे..इस चुनाव में सारंग ने 23 हजार 151 मतों से जीत हासिल की..

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(गरीब श्रद्धालुओं को मुफ्त तीर्थ यात्रा                                   (क्षेत्र की बहनों द्वारा बांधी गई राखियों

कराते कांग्रेस नेता मनोज शुक्ला)                                            के साथ मंत्री  विश्वास सारंग)

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पेचीदे हैं जातिगत समीकरण
दो विधानसभा सीट के हिस्सों को अलग कर बनी नरेला में जातिगत समीकरण अधिक अहम हैं.. 3 लाख 37 हजार 432 मतदाताओं वाली नरेला विधानसभा में करीब सवा लाख से अधिक वोट मुस्लिम समाज से हैं..इनके अलावा लगभग 60 हजार ब्राहमण व 12 से 13 हजार जैन मतदाता हैं..जो जीत हार के समीकरण बनाने में अहम भूमिका अदा करते हैं..मुस्लिम मतदाताओं की इस बड़ी संख्या को देखते हुए चुनाव से पूर्व अब तक ध्रुवीकरण के हालात बनते रहे हैं..दूसरी बड़ी संख्या ब्राह्मणों की है..

बीते कुछ वर्षों में क्षेत्र के ब्राह्मण नेताओं की प्रताड़ना ने इस वर्ग को नाराज किया है..इसका लाभ कांग्रेस के एक युवा नेता मनोज शुक्ला ने उठाया..उन्होंने न केवल ब्राह्मण मतदाता वर्ग में सेंध लगाई,बल्कि हिंदू कार्ड खेलते हुए वह लंबे समय से विभिन्न जातियों के गरीब मतदाताओं को अपने खर्चे पर लगातार धार्मिक यात्राएं करा रहे हैं..यह तबका गरीब वर्ग से है..जबकि पूर्ववर्ती कांग्रेस उम्मीदवार इन दांव पेंचों से दूर रहे…

नरेला के जातिगत समीकरण
कुल मतदाता     3,37,432
मुस्लिम            1 लाख 25 हजार
ब्राह्मण             60 से 70  हजार
जैन                 12 से 13  हजार

शुक्ला कांग्रेस नेता कैलाश मिश्रा व भाजपा नेता रमेश शर्मा गुट्टू भैया के निकट संबंधी भी हैं..नरेला में भाजपा नेताओं के बीच अंतर्कलह भी कम नहीं.. ऐसे में  कांग्रेस को मुस्लिम व ब्राह्मण मतदाताओं से बड़ी आस है..

इन समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस शुक्ला पर दांव लगा सकती है.. इधर,बीजेपी के मौजूदा विधायक एवं मंत्री सारंग क्षेत्र में उनके द्वारा कराए गए विकास कार्यों के भरोसे टिकट पाने के प्रबल दावेदार हैं..मंत्री रहते हुए भी क्षेत्र के मतदाताओं से सतत संवाद,संपर्क व सहज उपलब्धता उनकी खूबी रही है..

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* नरेला में ये फेक्टर भी रह सकते हैं प्रभावी
* कांग्रेस के मनोज शुक्ला क्षेत्र में हैं सक्रिय
* गरीबों को करा रहे मुफ्त धार्मिक यात्राएं
* कांग्रेस,भाजपा नेता मनोज के निकट संबंधी
* सारंग को विकास कार्य,सक्रियता पर भरोसा
* बीजेपी,कांग्रेस में कड़े मुकाबले के आसार
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नरेला,भोपाल
विधायक की छवि                       उत्तम
सरकार के प्रति ​नजरिया               अच्छा
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टिकट दावेदार Aspirants
बीजेपी: वर्तमान विधायक,मंत्री विश्वास सारंग,बीजेपी जिलाध्यक्ष सुमित पचौरी

कांग्रेस: युवा नेता मनोज शुक्ला,पूर्व प्रत्याशी महेंद्र सिंह चौहान,दीप्ति सिंह

बसपा: मेहरबान सिंह तितोरिया

आप: रेहान जाफरी

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वोट शेयर
चुनाव का ट्रेंड 45 फीसद मतदाता मुस्लिम,ध्रुवीकरण
year                   2018                  2013          2008
कांग्रेस                  42.00%              41.00%         45%
बीजेपी                  53.00%              56.00%         47%
बीएसपी                  1.00%               1.11%          00
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मुददे (Issues)
– गैस प्रभावित क्षेत्र,स्लम क्षेत्र में सीवेज की समुचित व्यवस्था नहीं
– गरीब व घनी आबादी वाली बस्तियों में सफाई का अभाव
– बढ़ती महंगाई एक बड़ी समस्या
– प्रशासन तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार,समय पर नहीं होते जरूरी काम
– क्षेत्र में लगभग सवा लाख मतदाता मुस्लिम,चुनाव में ध्रुवीकरण सामान्य बात
– आरक्षण से सामान्य वर्ग त्रस्त
– पेट्रोल,डीजल के बढ़े हुए दाम से मतदाता असंतुष्ट
– निम्न वर्ग के अनेक मतदाताओं के पास स्वयं का मकान नहीं
– अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी एक बड़ी समस्या