सत्ता के गलियारे से.. रवि अवस्थी

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ओबीसी की असली हितैषी
ओबीसी वर्ग की नेत्री कविता पाटीदार को राज्यसभा का प्रत्याशी घोषित कर इस वर्ग की सियासी लड़ाई में भाजपा एक बार फिर बाजी मार ले गई। कविता को प्रत्याशी बना कर उसने एक साथ कई सन्देश दिए हैं। ओबीसी वर्ग के साथ भाजपा का फोकस महिला वर्ग व पश्चिमी निमाड़ पर भी है। जहाँ पिछले चुनाव में उसे काफी निराश होना पड़ा था। कविता मालवा से है ,लेकिन उनकी उम्मीदवारी से सन्देश दूर तलक जाना तय है। सियासी तौर पर उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के नजदीक माना जाता है। वहीँ दूसरी ओर ,कांग्रेस ने एक बार फिर विवेक तन्खा पर दांव लगाया है। उन्हें दोहराए जाने से राज्यसभा के जरिये अपने दिन बहुरने की आस लगाए नेताओं का निराश होना स्वाभाविक है।

विशेषकर अरुण यादव ,जिनकी कुछ समय से कमलनाथ संग बढ़ी नजदीकी से उनकी उम्मीदवारी के कयास भी लगाए जा रहे थे। उन्हें नाउम्मीद कर पार्टी ने भाजपा को एक बार फिर उस पर हमला बोलने का मौका दिया। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस सिर्फ ओबीसी हितैषी होने का दिखावा करती है। इस वर्ग की असली हितैषी तो वह है ,फिर हाथ कंगन को आरसी क्या ? माना जा रहा है कि राज्यसभा की दूसरी सीट के लिए ,उसका दूसरा नाम भी काफी चौंकाने वाला होगा।

कमलनाथ की दो टूक
राज्यसभा के लिए कांग्रेस द्वारा ओबीसी वर्ग का उम्मीदवार नहीं बनाए जाने के आरोप पर सोमवार को कमलनाथ ने अपनी दो टूक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा – आज मतदाताओं में परिवर्तन है। जनता सब जानती है, यह नाटक नौटंकी सब समझती है। जाहिर है ,जाति की राजनीति से नेताओं का भले ही भला हुआ हो लेकिन वर्ग विशेष का प्रतिनिधि चुने जाने से उस वर्ग की आम जनता का कोई भला हुआ हो ,ऐसा तो अब तक देखा नहीं गया । सियासत के फेर में पहले जो 14 प्रतिशत आरक्षण का लाभ ओबीसी युवाओं को मिल रहा था ,वह और झमेले में पड़ गया।

दांव पर विधायकों की साख
नगरीय निकाय चुनाव को लेकर बीते दो साल से जारी अटकलबाजी और इनके टलने की सम्भावना ने निकायों की राजनीति करने वालों को लगभग बेफिक्र कर दिया था। इसके चलते चुनाव से पहले सड़कें ‘पुतवाने’ (जिस तरीके की सड़कें चुनावी बेला में बनती हैं ,उसे यही कहा जा सकता है। )शहरी क्षेत्र में निकले नेताओं ने ठेकेदारों को बाय कर लिया था। राजधानी की ही सड़कों को लेकर शासन स्तर से लगी फटकार बेअसर रही। सीपीए खत्म हो गया लेकिन सड़कें जस की तस नहीं बल्कि और बदतर हो गईं । बहरहाल ,बदले हालात में चुनाव के ‘अप्रत्याशित’ निर्णय ने इन बेफिक्र नेताओं की नींद उड़ा दी है। विशेषकर वे विधायक जिन पर अपने क्षेत्रों से महापौर व अध्यक्ष को जिताने की जिम्मेदारी है। अब जिनकी खुद की नैय्या भंवर में हो ,उनके जतन कितने कारगर होंगे,यह नतीजे बताएंगे।

रास आया जनभागीदारी मॉडल
कोरोना काल में मैदानी स्तर पर क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप गठित करने का फैसला तब हर किसी के लिए आश्चर्य का विषय हुआ करता था ,लेकिन प्रदेश के मुखिया शिवराज का यह मॉडल ऐसा सफल हुआ कि दूसरे राज्यों के लिए यह अनुकरणीय बन गया। न सिर्फ महामारी पर नियंत्रण बल्कि टीकाकरण में भी इन समूहों की अहम भूमिका रही। जनभागीदारी के इस मॉडल ने सत्ता के विकेंद्रीकरण,जनता से सीधे जुड़ाव और सरकारी योजनाओं को नीचे तक पहुंचाने की राह भी आसान बनाई। लाखों की संख्या में स्व-सहायता समूहों का सशक्तिकरण,बड़े पैमाने पर दीन दयाल अंत्योदय समितियों का गठन,जन अभियान परिषद के बैनर तले हजारों की संख्या में काम करते स्वयं सेवी संगठन और इसके बाद अब प्रदेश की 75 हजार से अधिक आंगनवाडियां। यह नेटवर्क किसी भी राजनीतिक दल को मजबूती देने के लिए काफी है और संगठन शिवराज की इसी खूबी का कायल भी है।

सज्जन के बिगड़े बोल
कुछ राजनेता अपने काम से ज्यादा बिगड़े बोल के लिए पहचाने जाते हैं। प्रदेश के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ऐसे ही नेताओं में शुमार हैं। हाल ही में मंदसौर दौरे पर पहुंचे वर्मा का जिन्ना प्रेम अचानक जागृत हो गया और देश के विभाजन कर्ता को उन्होंने साहब की उपाधि दे डाली। हालांकि यह पहला मौका नहीं है,इससे पहले प्रदेश कांग्रेस के नेता कुख्यात आतंकी ओसामा को भी इज्जत बख्श चुके हैं। बहरहाल,जिन्ना मामले में लानत-मलानत का भी सज्जन पर कोई फर्क नहीं पड़ा और अगले दिन नीमच के एक कार्यक्रम में वह मंदसौर सांसद को मूर्ख बताते हुए जिन्ना को देवदूत तक कह गए। चुनाव के दौर में उनके ये बोल कांग्रेस का क्या नफा-नुकसान पहुंचाएंगे , इसका खुलासा जुलाई में आने वाले स्थानीय निकायों के परिणाम से ही होगा।

फिर आहत हुई बापू की आत्मा
कुछ राजनेताओं के लिए महापुरुष सिर्फ उनकी राजनीति का माध्यमभर हैं। इनके नाम का सहारा लेकर वे वैतरणी पार करना चाहते हैं। महापुरुषों के प्रति सम्मान प्रदर्शन में वे ऐसा दिखाते हैं कि इनसे बड़ा उनका कोई अनुयायी नहीं,जबकि वास्तविकता कुछ और है। ऐसा ही एक वाक्या हाल ही में नीमच जिला कांग्रेस की बैठक में हुआ। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा की मौजूदगी में हुई इस बैठक की शुरुआत बापू की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुई। इसके बाद मंचासीन नेता स्वागत-सत्कार में ऐसे मशगूल हुए कि बापू की तस्वीर कब नीचे गिर चूर हुई,इन्हें पता ही नहीं चला। यह मामला मीडिया की सुर्खी बनने के बाद जिले के कांग्रेस नेता अब सफाई देते घूम रहे हैं।

यह भी खूब रही
अपराधी और पुलिस में कौन किस पर भारी ,कानून-व्यवस्था की स्थिति इस मामले में समीक्षक की भूमिका अदा करती है । प्रदेश में बीते कुछ महीनों के दौरान श्रृंखला बद्ध तरीके से जिलेवार घटित वारदातों ने आला अफसरों को आइना दिखाने का काम किया है। हद तो तब हो गई जब प्रदेश पुलिस के मुखिया ने एक रात पहले निरीक्षण के दौरान सीहोर जिले के जिस थाना प्रभारी के कामकाज पर संतोष जताया,वहीं अगले दिन 25 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों धरा गया। वह भी फरियादी से ही अड़ीबाजी में।